श्री कुन्थुगिरी

मंदिरे

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क्षेत्रपाल मन्दिर

इस क्षेत्र का यह सर्वप्रथम जिनालय है।
गर्भगृह और सभागृह के रूप में यह जिनालय दो भागों में विभाजित है। ये दोनों विभाग स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं गर्भगृह का स्थान लघु वेदी से संयुक्त है। यह वेदी नौ फीट लम्बी, नौ फीट चौड़ी और तीन इंच ऊँची है। उस वेदी के ठीक मध्यवर्ती भाग में क्षेत्रपाल का आलय है। यह आलय सदैव सिन्दूर से अथवा सिन्दूरी रंग से रंगा हुआ होता है। इस आलय में ढाई फीट की क्षेत्रपाल-प्रतिमा है। यह खड्गासन में विराजित है।
क्षेत्रपाल के ऊपरी भाग में एक सिंहासन विराजमान है। श्वेत पाषाण में निर्मित इस सिंहासन पर नौ इंच की पार्श्वनाथ प्रतिमा विराजमान है। यह प्रतिमा भी श्वेतवर्णीय पाषाण से निर्मित है।
सभागृह पच्चीस फीट लम्बा और बीस फीट चौड़ा है। हमेशा श्रमण संघ उसी स्थान से आहारचर्या के लिये निकलता है। इस जिनालय पर पन्द्रह फीट ऊँचा शिखर है।

समाधि मन्दिर

इस विषय में नियम यह है कि यदि दो वसतिकाओं का ग्रहण किया जाता है तो एक में क्षपक रहता है और दूसरी में यतिवर्ग रहता है। यदि तीन वसतिकाओं का ग्रहण किया जाता है तो एक में क्षपक, दूसरी में अन्य यति और तीसरी में धर्मोपदेश की क्रिया होती है।
आगम के इसी नियम को ध्यान में रख कर इस क्षेत्र पर समाधिमन्दिर का निर्माण किया गया है। जब क्षपक यमसल्लेखना को ग्रहण करते हैं, तब उनका निवास उस मन्दिर में कराया जाता है।
समाधिमन्दिर में दो कमरे और एक भवन है॥

आगम मन्दिर

श्री त्रिभुवन चूड़ामणि, चिन्तामणि, कलिकुण्ड पार्श्वनाथ जिनालय दक्षिणी हाथ में नीचे की ओर यह मन्दिर अवस्थित है । यह मन्दिर इकतालीस फीट लम्बा, पच्चीस फीट चौड़ा और इकतीस फीट ऊँचा है । मन्दिर की बाहरी भीत्ति पर श्यामवर्णीय पाषाण में गणधराचार्य श्री का उपदेश उत्कीर्ण है ।
इस मन्दिर में ढाई फीट लम्बी, ढाई फीट चौड़ी और साढ़े तीन फीट ऊँची वेदिका है । इस वेदिका पर श्याम वर्णीय पाषाण से निर्मित पार्श्वनाथ भगवान की और श्वेतवर्णीय पाषाण से निर्मित महावीर भगवान की प्रतिमा विराजमान है । इन दोनों प्रतिमाओं की अवगाहना आधा फीट की है । इन दोनों प्रतिमाओं के साथ अन्य अनेक प्रतिमायें इसी वेदी पर स्थापित है ।
वेदिका के मध्यभाग में श्वेतपाषाण से निर्मित पाँच ऊँचा श्रुतस्कन्धयन्त्र है । इस यन्त्र की चौड़ाई साढ़े तीन फीट की है । वेदिका के नीचली कटनी पर माता सरस्वती की प्रतिमा है । यह प्रतिमा पाँच फीट उन्नत है । उसके पास ही तीन फीट ऊँची घण्टाकर्ण की प्रतिमा विराजमान है ।
इस भवन में चौरासी कपाट रखे हैं । उनमें जिनवाणी को विराजमान किया हुआ है । आरम्भ में परम पूज्य गणाधिपति, गणधराचार्य श्री कुन्थु सागर जी महाराज द्वारा लिखित व्रतकथाकोश, लघुविद्यानुवाद, ज्वालामालिनी कल्प, हुम्बुज श्रमण सिद्धान्त पाठावलि, स्याद्वाद-केशरी आदि ग्रन्थों को विराजमान किया गया है। तदुपरान्त चारों अनुयोगों के ग्रन्थ विराजित किये गये हैं। इस ग्रन्थालय में पाँच से सात हजार ग्रन्थ होने की सम्भावना है। ये ग्रन्थ विविध प्रकाशनसंस्थाओं से प्रकायित हुये हैं। जैनग्रन्थों के साथ-साथ अजैन ग्रन्थ और विविध साहित्य के पुस्तकों को भी ग्रन्थालय में स्नि दिया गया है। यदि कोई शोधार्थी इस ग्रन्थालय का लाभ उठाना चाहे तो उसके लिये यहाँ सम्पूर्ण व्यवस्था प्राप्त होती है।

स्तुति
अज्ञानतिमिरं हन्त्री, ब्राह्मिणी विश्वमातरम।
मरालवाहनं नौमि, भारती स्वगुणाप्तये॥
अर्थात् : अज्ञानतिमिरम् अज्ञानरुपी अन्धकार का हन्त्री विनाश करने वाली, ब्राह्मिणी ब्राह्मणी, विश्वमातरम् विश्वमाता, मरालवाहनं मयूरवाहिनी, भारतीम् सरस्वती को स्वगुणाप्तये स्वात्मगुणों की प्राप्ति के लिये मैं नौमि नमस्कार करता हूँ्।



अर्थ्य
माँ जिनवाणी जन कल्याणी, जीवों का हित कस्ती हो।
अज्ञतिमिर से सहित जीव में, आत्मज्ञान को मस्ती हो।
अष्टद्रव्य का थाल सज़ा कर, मैं माता को यजता हूँ्।
ज्ञानसूर्य का उदय हृदय में, करने में नित भजता हूँ्।



श्री त्रिभुवन चूड़ामणि, चिन्तामणि, कलिकुण्ड पार्श्वनाथ जिनालय की वाम दिशा में नीचे की ओर यह मन्दिर अवस्थित है ।
यह मन्दिर इकतालीस फीट लम्बा, पच्चीस फीट चौड़ा और इकतीस फीट ऊँचा है ।

गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु है, गुरु हैं शंकर शिवरुप ।
उनके द्वयचरणों नमूँ, बनने जग का भूप॥

गुरु मन्दिर

इस मन्दिर में परम पूज्य आचार्यश्री लोहाचार्य जी महाराज, आचार्यश्री भद्रबाहु जी महाराज, आचार्यश्री अर्हद्बली जी महाराज, आचार्यश्री आर्यमंक्षु जी महा-राज, आचार्यश्री नागहस्ति जी महाराज, आचार्यश्री गुणधर जी महाराज, आचार्य-श्री यतिवृषभ जी महाराज, आचार्यश्री भूतबली जी महाराज, आचार्यश्री पुष्प-दन्त जी महाराज, आचार्यश्री कुन्दकुन्द जी महाराज, आचार्यश्री उमास्वामी जी महाराज, आचार्यश्री समन्तभद्र जी महाराज, आचार्यश्री पूज्यपाद जी महाराज, आचार्यश्री जिनसेन जी महाराज (प्रथम), आचार्यश्री जिनसेन जी महाराज (द्वितीय), आचार्यश्री रविषेण जी महाराज, आचार्यश्री योगीन्दु जी महाराज, आचार्यश्री माणिक्यनन्दी जी महाराज, आचार्यश्री जिनसेन जी महाराज, आचार्यश्री अमृतन्द्र जी महाराज, आचार्यश्री प्रभाचन्द जी महाराज, आचार्यश्री वीरसेन जी महाराज, आचार्यश्री गुणभद्र जी महाराज, आचार्यश्री जयसेन जी महाराज, आचार्यश्री जिनसेन जी महाराज, आचार्य श्री इन्द्रनन्दी जी महाराज, आचार्य श्री ने मिचन्द्र जी महाराज, आचार्य श्री मल्लिषण जी महाराज, आचार्य श्री शुभचन्द्र जी महाराज, आचार्यश्री पद्मनन्दी जी महाराज, आचार्यश्री सकलकीर्ति जी महाराज, आचार्यश्री सोमदेव जी महाराज, आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज, आचार्यकल्पश्री चन्द्रसागर जी महाराज, आचार्यश्री आदिसागर जी महाराज (अंकलीकर) की प्रतिमायें स्थापित हैं। इन प्रतिमाओं की अवगाहना अठारह इंच की है।इसी अवगाहना वाली आचार्य-परमेष्ठी की एक स्वतन्त्र प्रतिमा भी इसी मन्दिर में स्थापित है। इस मन्दिर के मध्यवर्ती भाग में रत्नों की प्रतिमायें विराजमान हैं। अनेक प्रकार के रत्नों से निर्मित इन प्रतिमाओं के लिये विभिन्न उपवेदियाँ बनायी गयी हैं।

उन प्रतिमाओं के समक्ष परम पूज्य अष्टादशभाषाभाषी, तीर्थभक्त-शिरोमणि, 3 आचार्यश्री महावीरकीर्ति जी महाराज, परम पूज्य निमित्तज्ञान-शिरोमणि, आचार्यश्री विमलसागर जी महाराज तथा परम पूज्य गुरुभक्त-शिरोमणि, आचार्यश्री सन्मतिसागर जी महाराज की तीन फीट उन्नत प्रतिमायें विराजमान करायी गयी है। रत्नप्रतिमाओं से संयुक्त इस परिसर को स्थानीय जनसमुदाय सिद्धान्तदर्शन नाम से जानता है। सिद्धान्तदर्शन के दक्षिण हाथ में पीछे की ओर पांच मेरुओं को स्थापित किया गया है। ये मेरु पाँच/पाँच फीट उन्नत ह््ैं। सिद्धान्तदर्शन के वाम हाथ में पीछे की ओर बाली मुनिराज की -फीट उन्नत प्रतिमा है। साथ में पूज्या गणिनी आर्यिकाश्री विजयमती माताजी की प्रतिमा है। उस प्रतिमा के समीप ही माता सोहनदेवी की प्रतिमा है, जिसकी गोदी में बाल कन्हैया (परम पूज्य गणाधिपति, गणधराचार्यश्री कुन्थुसागर जी महाराज का बचपन का नाम) अवस्थित है ।
विशेष यह है कि इस मन्दिर की अन्तत्तियों पर परम पूज्य स्याद्वादकेशरी, आचार्य श्री कुन्थु सागर जी महाराज की जीवन-झाँकी के चित्र रेखांकित किये गये ह््ैं। आचार्यश्री के बचपन से लेकर अब तक के चौहत्तर चित्र इस झाँकी के माध्यम से सजाये गये ह््ैं। इनके द्वारा आचार्यश्री के सम्पूर्ण व्यक्तित्व एवं कर्तुत्व को जाना जा सकता है।

शान्तिनाथ मन्दिर

श्री त्रिभुवन चूड़ामणि, चिन्तामणि, कलिकुण्ड पार्श्वनाथ जिनालय की दक्षिण-वर्ती हाथ में यह जिनालय विशाल प्रांगन में अवस्थित है । भूतल पर एक वलयाकार वेदी है । दो फीट ऊँची इस वेदी पर एक सुन्दर कमल है । उस कमल पर भगवान शान्तिनाथ की प्रतिमा विराजित है । श्यामवर्णीय पाषाणखण्ड में निर्मित इस खड्गासनासीन प्रतिमा की अवगाहना पन्द्रह फीट है ।

शान्तिनाथ को मैं नमूँ, आत्मशान्ति के काज ।
कर्मशत्रु का दलन कर, बन जाऊँ शिवराज ॥


स्तुति
अपारासारसंसारजलध्युत्तारकारणम्।
शान्तिनाथं जगन्नाथं, त्रियोगेन नमाम्यहम्॥
अर्थात् : अपारासारसंसारजलध्युत्तारकारणम् अपार, असार, संसाररुपी सागर से पार होने में जो कारण हैं उन जगन्नाथम् जगत् के नाथ शान्तिनाथम् शान्तिनाथ भगवान को अहम् मैं त्रियोगेन तीन योगों से नमामि नमस्कार करता हूँ।

अर्घ्य
जलगन्धादिक अष्ट द्रव्य से, रत्नमयी ये थाल सजाय ।
अर्घ्य चढ़ाने में आया हूँ, शान्तिनाथ के पावन पाय ।
शान्तिनाथ की पूजन करते, जो भविजन मन-वच अरु काय।
उसके पुण्यकलश भर जाते, कर्मशत्रु भी जाय पलाय॥

भरत मन्दिर

श्री त्रिभुवन-चूड़ामणि, चिन्तामणि, कलिकुण्ड पार्श्वनाथ जिनालय की दक्षिण दिशा में सामने की ओर यह जिनालय अवस्थित है ।
यह मन्दिर बारह फीट लम्बा, बारह फीट चौड़ा और इकतीस फीट ऊँचा है ।

आद्य चक्री इस काल के, श्रेष्ठ भरत भगवान।
उनके चरणों में नमूँ, करने अघ-अवसान ॥



इस जिनालय में भगवान भरत की मूर्ति विराजमान है । गुलाबी वर्ण के पाषाण से निर्मित यह प्रतिमा खड्गासन में आसीन है । इसकी ऊँचाई पाँच फीट की है ।
भरत भगवान की यह प्रतिमा दो फीट लम्बी, दो फीट चौड़ी और ढ़ेढ़ फीट ऊँची वेदी पर स्थित है ।

कुलधर्म का कर दिया, भारत में सुप्रचार ।
शान्तिसिन्धु को नित नमूँ, जो थे वृष-अवतार ॥


इस जिनालय के ठीक सामने तीन शिखरों वाला लघुकाय मन्दिर है । इसमें परम पूज्य चारित्र-चक्रवर्ती, आचार्यश्री शान्तिसागर जी महाराज की प्रतिमा विराजमान है । गुलाबी रंग में रंगी हुयी यह प्रतिमा केवल विलाकनीय है । इसकी ऊँचाई ढाई फीट की है ।

बाहुबली मन्दिर

श्री त्रिभुवन चूड़ामणि, चिन्तामणि, कलिकुण्ड पार्श्वनाथ जिनालय की वाम दिशा में सामने की ओर यह जिनालय अवस्थित है ।
यह मन्दिर बारह फीट लम्बा, बारह फीट चौड़ा और इकतीस फीट ऊँचा है।



कामदेव योगीपुरुष, बाहुबली तव ध्यान।
जो भवि करते नित्य ही, उनका हो कल्याण ॥



इस जिनालय में भगवान बाहुबली की मूर्ति विराजमान है । गुलाबी वर्ण के पाषाण से निर्मित यह प्रतिमा खड्गासन में आसीन है । इसकी ऊँचाई पाँच फीट की है ।
बाहुबली भगवान की यह प्रतिमा दोन फीट लम्बी, दो फीट चौड़ी और देढ़ फीट ऊँची वेदी पर स्थापित है ।

चक्रवर्ती चारित्र के, आदिसिन्धु मुनिराज।
दर्श-शिरोमणि को नमूँ, करने हितकर काज ॥



इस जिनालय के ठीक सामने तीन शिखरों वाला लघुकाय मन्दिर है । इसमें परम पूज्य चारित्र-चक्रवर्ती, आचार्यश्री आदिसागर जी महाराज (अंकलीकर) की प्रतिमा विराजमान है । गुलाबी रंग में रंगी हुयी यह प्रतिमा केवल विलाकनीय है । इसकी ऊँचाई तीन फीट की है ।

चरण मन्दिर

महावीरकीर्ति गुरुपद, मैं वन्दूँ त्रिकाल ।
आत्मसम्पदा मैं वरुँ, कूँ काल का काल ॥
जो भी इन चरणों नमें, पाते आत्मस्वभाव ।
चेतन गुण को प्राप्त कर, करते दूर विभाव ॥


श्री त्रिभुवन चूड़ामणि, चिन्तामणि, कलिकुण्ड पार्श्वनाथ जिनालय में विराजित पद्मावती-जिनालय के ऊपर स्थित विशाल कलश में परम पूज्य समाधि-सम्राट्, अष्टादशभाषाभाषी, आचार्यश्री महावीरकीर्ति जी महाराज की चरण-पादुका विराजमान है । यह पादुका कमलासन में विराजमान है । इसकी स्थापना एक वेदिका पर की गयी है । वेदिका का कार्य प्रगति पर है ।



विमलसिन्धु गुरुदेव के, श्रीचरणों को ध्याय ।
ऋद्धि सिद्धि समृद्धि अरु, सर्वसम्पदा पाय ।
रागद्वेषमदमोह सब, तत्क्षण जात पलाय ।
आधि व्याधि संकट मिटे, स्वर्गपुरी को जाय ॥


श्री त्रिभुवन चूड़ामणि, चिन्तामणि, कलिकुण्ड पार्श्वनाथ जिनालय में विराजित धरणेन्द्र-जिनालय के ऊपर स्थित विशाल कलश में परम पूज्य समाधि-सम्राट्, निमित्तज्ञान-शिरोमणि, आचार्यश्री विमलसागर जी महाराज की चरणपादुका विराजमान है । इस पादुका की स्थापना एक वेदिका पर की गयी है । इस व ेदी का कार्य प्रगति पर है ।

मानस्तम्भ

करे मान का स्तम्भ जो, मानस्तम्भ कहाय।
जो करते नित वन्दना, मार्दव धर्म उपाय॥
में भी वन्दन कर रहा, आज भक्ति उर धार ।
कर्मश का हनन कर, पाऊँ ज्ञान अपार।


क्षेत्रपालमन्दिर से बारह फीट के अन्तर पर मानस्तम्भ है। यह मानस्तम्भ मारबल पाषाण से निर्मित है। इसकी अवगाहना इकतालीस फीट है। इसकी संरचना नयनरम्य है।

इस स्तम्भ की पहली कटनी की चारों विदिशाओं में एक-एक गजमुख है तथा दिशाओं में श्रीवत्स का चिह्न है। इस स्तम्भ की दूसरी कटनी की चारों में विदिशाओं में एक-एक गजमुख है तथा । दिशाओं में कमल का चिह्न है। इस पर प्रत्येक दिशाओं में तीन-तीन यक्षियों की स्थापना की गयी है। इस स्तम्भ की तीसरी कटनी की चारों विदिशाओं में एक-एक गजमुख है तथा दिशाओं में पुष्प का चिह्न है। इस पर भी प्रत्येक दिशाओं में तीन-तीन यक्षियों की स्थापना की गयी है। इस स्तम्भ की चौथी कटनी की नवग्रहों की स्थापना की गयी है। इस स्तम्भ के उपरिम भाग में जिनालय है। उस जिनालय की चारों दिशाओं में खड़गासनासीन एक-एक जिनप्रतिमा स्थापित की गयी है। श्वेत मकराना पाषाण में बने इस मानस्तम्भ की प्रत्येक मूर्ति की ऊँचाई देढ फीट है। क्षेत्रपाल के ऊपरी भाग में एक । सिंहासन विराजमान है। श्वेतपाषाण में निर्मित इस सिंहासन पर नौ इंच की पार्श्वनाथ प्रतिमा विराजमान है। यह प्रतिमा भी श्वेतवर्णीय पाषाण से निर्मित है। सभागृह पच्चीस फीट लम्बा और बीस फीट चौड़ा है। हमेशा श्रमणसंघ इसी स्थान से आहारचर्या के लिये निकलता है। इस जिनालय पर पन्द्रह फीट ऊँचा शिखर है।

साधुओं के निवासस्थल को वसतिका कहते हैं। साधना की सिद्धि में वसतिका का भी महत्व आचार्यों ने स्वीकार किया है।

जो सल्लेखना को ग्रहण करता है उसे पक कहते हैं। आचार्यश्री शिवार्य जी महाराज ने क्षेपक की वसतिका के विषय में एक विशिष्ट नियम लिखा है। यथा


सुहणिक्खेवणपवेसणघणाओ अवियड अधयाराओ। दो तिण्णि वि वसधीओ घेत्तवाओ विसालाओ॥ (भगवती आराधना = 636)


अर्थात् : जिसमें बिना कष्ट के सुखपूर्वक प्रवेश और निर्गमन हो रहा है, जिसका द्वार खुला हुआ नहीं हो, जिसमें अन्धकार नहीं हो-ऐसी दो अथवा तीन विशाल वसतिकाओं का ग्रहण करना चाहिये।

गुरुप्रतिमा

मानस्तम्भ से आगे परम पूज्य ज्ञान-मणि, भारत-गौरव, स्याद्वादकेशरी, वात्सल्यरत्नाकर, आर्षपरम्परापोषक, गणाधिपति, गणधराचार्यश्री कुन्थुसागर जी महाराज की खड्गासन प्रतिमा है, जो श्वेतपाषाण से निर्मित है । यह प्रतिमा हाथ में पिच्छिका लेकर पार्श्वनाथ भगवान को नमस्कार करने वाली मुद्रा में विराजित है । यह प्रतिमा पाँच फीट उन्नत है ।

पार्श्वनाथ जिनालय

यह इस क्षेत्र का यह विशालतम जिनालय है। इसी जिनालय को श्री त्रिभुवन चूड़ामणि, चिन्तामणि, कलिकुण्ड पार्श्वनाथ जिनालय कहा जाता है। यह जिनालय सत्तर फीट लम्बा और साठ फीट चौड़ा है। जिनालय के सामने एक बरामदा है। जिनालय की परिक्रमा करने के लिये पर्याप्त जगह छोड़ी गयी है। इस जिनालय की कलाकृति अत्यन्त दर्शनीय है। जिनालय की बाहा भीत्तियों पर रामायण । के चित्र अंकित किये गये हैं। लगभग दो सौ पच्चीस चित्रों में सम्पूर्ण रामायण को प्रस्तुत करने का यह प्रयत्न अत्यन्त स्तुत्य है। इन चित्रों में से अधिकांश चित्र आचार्यश्री रविषेण जी महाराज द्वारा रचे गये पदापुराण नामक ग्रन्थ के आधार पर बनाये गये हैं। जिनालय की सम्मुख भीत्तिका पर भगवान पार्श्वनाथ के दस भवों के चित्र अंकित किये गये हैं। जिनालय में कुल छह स्तम्भ हैं। उन स्तम्भों पर चौबीस तीर्थंकरों के चित्र अंकित किये गये हैं। प्रत्येक चित्र के नीचे भगवान का नाम और उनके चिह्न अंकित किये गये हैं। इन स्तम्भों पर चौबीस यक्ष और चौबीस यक्षियों के भी चित्र अंकित हैं। प्रत्येक चित्र के नीचे उनके नामों का भी अंकन किया हुआ है। विशेष बात यह है कि इन स्तम्भों पर आचार्यश्री कुमुदचन्द्र जी महाराज द्वारा रचित कल्याणमन्दिर स्तोत्र अंकित किया हुआ हैं स्तोत्र के साथ स्तोत्रकाव्य का मन्त्र, ऋद्धिमन्त्र और प्रत्येक काव्य का यन्त्र भी बनाया हुआ है। जिनालय के अन्तवर्ती भीत्तियों के उपरम भाग में स्तोत्रराज श्री कल्याणमन्दिर चवालीस चित्र बनाये हुये हैं। के प्रत्येक काव्य का अर्थ और उसके आधार पर इन चवालीस चित्रों का निर्माण हुआ है। जिनालय के अन्तवर्ती भीत्तियों के नीम्नवर्ती भाग में सत्ताईस चित्रों का निर्माण किया गया है। इनमें रविव्रत कथा को चित्रांकित किया गया है। इनके मध्य में एक चित्र और भी है। इसमें भगवान पार्श्वनाथ, गणधराचार्यश्री माता पद्मावती, भुआजी, ब्रह्मचारिणी जयश्री दीदी और ब्रह्मचारिणी पूनम दीदी के चित्र अंकित किये हुये हैं।

पार्श्वप्रभु के गुण अगम, महिमा अपरम्पार ।
नमन करो उनको सभी, पाओ सौख्य अपार ॥

श्री त्रिभुवन चूड़ामणि, चिन्तामणि, कलिकुण्ड पार्श्वनाथ जिनालय में मूल-नायक मूर्ति के रुप में श्री पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा विराजमान है । एस सौ आठ फणों वाले इस विशालकाय मूति का निर्माण श्वामवर्णीय पाषाण से हुआ है । प्रत्येक फणा में दो-दो रत्न भी जड़े हुये है । मूर्ति के नीचे कलिकुण्डयन्त्र बना हुआ है । यन्त्र पर नागासन है और उस पर जिनप्रतिमा है । यह प्रतिमा नौ फीट उन्नत है । संघ प्रतिदिन इसी प्रतिमा का पंचामृत-अभिषेक देखता है । मूलनायक प्रतिमा के आगे चिन्तामणि पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा विराजमान है । श्वेतपाषाण से निर्मित यह प्रतिमा एक कमल पर विराजमान है । यह प्रतिमा ढाई फीट उन्नत है ।

प्रतिमा के सामने एक लघुकाय वेदी है । उस पर पार्श्वनाथ भगवान के यक्ष धरणेन्द्र और यक्षी पद्मावती की धातुमयी प्रतिमा स्थापित की हुयी है । इन दोनों की ऊँचाई ग्यारही फीट की है । अन्य अनेक धातुमयी प्रतिमा इस वेदी पर तथा भगवान पार्श्वनाथ के आसपास विराजमान की हुयी है । इस जिनालय की ख्याति और चमत्कार की किंवदन्तियाँ अतिशय प्रचलित हैं।

स्तुति
भवज्वलनसन्तप्तसत्वशान्तिसुधाकरम्।
भव्यकल्पतरुं नौमि, पार्श्वनाथं गुणालयम्॥


अर्थात्: भवज्वलनसन्तप्तसत्वशान्तिसुधाकरम् संसार की अग्नि में सन्तप्त जीवों के लिये जो शान्ति का अमृतसागर हैं, जो गुणालयम् गुणों के आवासस्थल हैं, उन भवयकल्पतरुम् भव्य जीवों के लिये कल्पवृक्ष के समान पार्श्वनाथम् भगवान पार्श्वनाथ को मैं नौमि नमन करता हूँ।

अर्घ्य
पार्श्वप्रभु जी गुणगणनायक, स्वात्मसुधारस के धारी ।
चिन्तक फल के दायक हो तुम, विघ्नहार मंगलकारी ॥
पूज्यपाद के चरणकमल को, जल-फल आदि चढ़ाता हूँ।
पूजनफल से शिवपथ में मैं, अपने कदम बढ़ाता हूँ॥






पार्श्वप्रभु के यक्ष हैं, श्री धरणेन्द्र महान।
जिनशासन की वृद्धि का, करते हैं नित काम ॥


श्री त्रिभुवन चूड़ामणि, चिन्तामणि, कलिकुण्ड पार्श्वनाथ जिनालय में मूल-नायक मूर्ति के दाये हाथ पर धरणेन्द्र की वेदिका है । इसके लिये काँच का एक उप-देवालय तैयार किया हुआ है ।

इस देवालय में तीन फीट ऊँचे नागासन पर पाँच फीट उन्नत धरणेन्द्र की प्रतिमा विराजमान की हुयी है । यह प्रतिमा अत्यन्त भव्य और मनमोहन है । इस प्रतिमा के मस्तक पर इक्कीस इंच ऊँची भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा विराजमान है । यह प्रतिमा श्यामवर्णीय पाषाण से निर्मित की गयी है । विशेष पर्वों के अवसर पर इस क्षेत्र में विशेष पूजाओं का आयोजन किया जाता है ।


स्तुति
सम्यग्दर्शनसम्पन्न:, जिनशासनभाक्तिक:।
धरणेन्द्र: सदा ध्येय:, सद्दर्शनविशुद्धये ॥


अर्थात्: सम्यग्दर्शनासम्पन्न: सम्यग्दर्शन से सम्पन्न, जिनशासनभाक्तिक: जिनशासन की भक्ति करने वाला धरणेन्द्र: धरणेन्द्र सद्दर्शनविशुद्धये सम्यग्दर्शन की विशुद्धि के लिये सदा सदैव ध्येय: ध्येयरुप है ।

अर्घ्य
पार्श्वप्रभु के शासनरक्षक, धरण-इन्द्र है गुणकारी।
भव्य जीवों के संकटहारक, सम्यग्दर्शनगुणधारी ।
निकट भव्य इस भक्तराज को, यज्ञ अंश हम देते हैं।
उन जैसी श्रध्दा पाने को, स्थान हृदय में देते हैं॥

पार्श्वप्रभु के यक्षि हैं, पद्मावती गुणधाम।
जिनशासन-अभिवृद्धि का, करती है वह काम॥

श्री त्रिभुवन चूड़ामणि, चिन्तामणि, कलिकुण्ड पार्श्वनाथ जिनालय में मूल-नायक मूर्ति के बाये हाथ पर पद्मावती की वेदिका है। इसके लिये काँच का एक उप-देवालय तैयार किया हुआ है।

इस देवालय में तीन फीट ऊँचे नागासन पर पाँच फीट उन्नत पद्मावती की प्रतिमा विराजमान की हुयी है। यह प्रतिमा अत्यन्त भव्य और मनमोहक है। इस प्रतिमा के मस्तक पर इक्कीस इंच ऊँची भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा विराजमान है। यह प्रतिमा धातुमयी है। विशेष पर्वो के अवसर पर इस क्षेत्र में विशेष पूजाओं का आयोजन किया जाता है। भक्त जनों में इसके चमत्कारों की अनेक अनुश्रुतियाँ प्रचलित हैं।


स्तुति
दर्शनज्ञानधारिका, जिनभक्ता सदाशयी।
पद्मावती सदा ध्येया, सद्दर्शनविशुद्धये॥


अर्थात् : दर्शनज्ञानधारिका सम्यग्दर्शन और सम्यग्द्वान को धारण करने वाली, जिनभक्ता जिनेन्द्र भगवान की भक्ति करने वाली, सदाशयी सत् आशय से सम्पन्न, पद्मावती पद्मावती सद्दर्शनविशुद्धये सम्यग्दर्शन की विशुद्धि के लिये सदा सदैव ध्येया ध्येयरूप है।


अर्घ्य
पार्श्वप्रभु के शासनरक्षक, धरण-इन्द्र है गुणकारी।
भव्य जीवों के संकटहारक, सम्यग्दर्शनगुणधारी।
निकट भव्य इस भक्तराज को, यज्ञ अंश हम देते हैं।
उन जैसी श्रद्धा पाने को, स्थान हृदय में देते हैं।

कैलासपर्वत

भगवान आदिनाथ ने आठ कर्मों का विनाश कर मोक्ष को प्राप्त किया । कैलासपर्वत अर्थात् अष्टापदपर्वत से उन्होंने निर्वाण को प्राप्त किया । वह अष्टापद अनेक भव्यात्माओं की निर्वाण भूमि के रुप में प्रसिद्ध है । प्रथम चक्रवर्ती भरत ने इसी क्षेत्र पर त्रिकालवर्ती चौबीसी की स्थापना की थी । बाली मुनि ने इसी पर्वत पर आत्मसाधना की थी । इसी पर्वत को उठाने के प्रयत्न में दशानन का नाम रावण हुआ था । दुर्भाग्य से आज यह पावन तीर्थधाम भारत की सीमारेखा में नहीं है । कहते हैं कि यह तीर्थ चीन में है । उसके दर्शन आज प्राय: असम्भव है । उस पावन तीर्थधाम की प्रतिकृति इस क्षेत्र पर निर्मित की गयी है ।

इस पर्वत की गुफा में विशालकाय जिनालय की रचना की गयी है । इसमें भगवान मुनिसुव्रतनाथ की पाँच फीट उन्नत प्रतिमा विराजमान है । इस श्याम-वर्णीय प्रतिमा की प्रतिष्ठा जिस दिन हुयी, उसी दिन से इसके अतिशय की ख्याति लोकविश्रुत हुयी । अब प्रत्येक माह की अमावस्या के दिन यहाँ महाअभिषेक होता है । शनिग्रह के अरिष्ट का निवारण करने के लिये लोग इस प्रतिमा का अभिषेक करते हैं । यह प्रतिमा अतिशय मनोज्ञ है । यक्ष-यक्षी से सम्पन्न इस प्रतिमा को देखने पर मन तृप्त नहीं होता । यह प्रतिमा सुखासन में स्थित है ।


मूलनायक भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी के दक्षिण हाथ पर परिक्रमा में एक वेदिका संस्थित है । इस वेदिका पर आदि तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की प्रतिमा विराजमान है । यह प्रतिमा भी श्यामवर्ण की धारिका है । इस प्रतिमा की ऊँचाई पाँच फीट है ।

यह प्रतिमा नयनरम्य है । यक्ष-यक्षी और परिकरसहित यह प्रतिमा अतिशय भव्य है ।


मूलनायक भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी के पीछे परिक्रमा में एक वेदिका है । इस वेदिका पर महादेवी पद्मावती की प्रतिमा स्थापित है ।

यह माता चौबीस भुजाओं से युक्त है । ग्यारह फीट अवगाहना को धारण करने वाली यह माता इस क्षेत्र का प्रमुख आकर्षण है । प्रतिमा अतिशय मनोज्ञ है । भक्तगण इसकी गोद भरने के लिये सदैव लालायित रहते हैं ।


मूलनायक भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी के बायें हाथ में परिक्रमा में एक वेदिका है । इस वेदिका पर अम्बिका, ज्वालामालिनी और चक्रेश्वरी की प्रतिमायें मनोज्ञ प्रतिमायें विराजित हैं । ये तीनों ही प्रतिमायें दो-दो फीट उन्नत हैं ।


दिगम्बर जैनों की चौरासी जातियाँ हैं । इनमें खण्डेलवालजाति का अपना विशिष्ट गौरव है । इस जाति में भी चौरासी गोत्र हैं । प्रत्येक गोत्र की कुलदेवी है । सम्पूर्ण भारतभर में रहने वाले खण्डेलवाल जातीय श्रावकबन्धु अपनी कुलदेवी का दर्शन करने के लिये राजस्थशन में विभिन्न स्थानों पर जाते हैं । समय, धन आदि का विनियोग करने पर भी उन्हें अनेक असुविधायें प्राप्त होती हैं ।

उनकी दुविधा को नष्ट करने के लिये कैलासपर्वतस्थ गुफा में संस्थित भगवान मुनिसुव्रतनाथ की बाह्य परिक्रमा में कुलदेवताओं की स्थापना की गयी हैं श्यामवर्णीय पाषाण से निर्मित इन प्रतिमाओं की ऊँचाई ढाई फीट है । प्रतिमायें अतिशय मनोज्ञ और परिकरसहित हैं ।


कुलदेवता के उपरान्त बीस वेदियों में विदेह क्षेत्र में विद्यमान बीस तीर्थंकरों की बीस प्रतिमायें विराजमान हैं । सीमन्धर-युगमन्धर-बाहु-सबाहु-सुजात-स्वयम्प्रभ-वृषभानन-अनन्त वीर्य-सुरप्रभ- विशालकीर्ति- वज्रधर-चन्द्रानन-भद्रबाहु - भुजंगम - ईश्वर - नेमिप्रभ - वीरसेन - महाभद्र - देवयश- अजिवतीर्य इन बीस तीर्थंकरों की प्रतिमायें परिकरसहित हैं । प्रत्येक प्रतिमा साढ़े तीन फीट उन्नत है । ये सारी प्रतिमायें श्यामवर्णीय पाषाण से निर्मित की गयी हैं । सभी प्रतिमायें खड्गासन अवस्था में स्थित हैं ।


कैलासपर्वत तीन कटनियों वाला है । पर्वत की पहली कटनी पर भूतकालिन चौबीस तीर्थंकरो की श्वेतपाषाण से निर्मित प्रतिमायें विराजित की गयी हैं ।

इन प्रतिमाओं के लिये पहले एक-एक पर्वतकूट की रचना की गयी है । उस लघुकाय पर्वतकूट पर पर चैत्यालय स्थापित है और उसमें प्रतिमायें हैं ।

पर्वत की दूसरी क टनी पर वैसी ही प्रतिमायें हैं । ये चौबीस प्रतिमायें भविष्यकालीन तीर्थंकरों की हैं । पर्वत की तीसरी कटनी पर वर्तमानकालीन चौबीस तीर्थंकरों की प्रतिमायें चौबीस कूटों पर विराजमान हैं । यह बहत्तर प्रतिमायें पन्द्रह-पन्द्रह इंच की हैं । सभी प्रतिमायें श्वेतवर्णीय पाषाणखण्ड से निर्मित की गयी हैं । प्रतिष्ठाशास्त्रों में प्रतिमा के मुखमण्डल की जिस प्रकार चर्चा की गयी है, वैसी ही मुखमुद्रा इन प्रतिमाओं की है । कैलासपर्वत की परिक्रमा में आदिनाथ भगवान का जीवन-चरित्र चित्रांकित किया गया है । इसके अतिरिक्त अनेक चित्र भी इस पर्वत की सुन्दरता की श्रीवृद्धि कर रहे हैं ।

जब इस क्षेत्र पर अष्टापदपर्वत की संकल्पना की गयी, तब यह निर्णय हुआ था कि इस पर्वत पर भगवान आदिनाथ की विशालकाय प्रतिमा विराजमान करनी है । संकल्पना को साकाररुप देने के लिये पाषाणखण्ड की खोज की गयी । प्रयत्न को बहुत दिनों तक सुयश नहीं मिला । किसी पाषाणखण्ड में दाग थे तो किसी पाषाणखण्ड में अन्य कोई दोष था । उन स भी को निरस्त किया गया । इस प्रतिमा के लिये ऐसे पाषाणखण्ड का अन्वेषण किया जा रहा था, जिसमें किसी प्रकार का दाग न हो, जिस पर सैकड़ों वर्षों तक धूप, हवा और पानी का कोई असर न हो, जो कोमल न हो । अन्वेषक अनवरत असफल हो रहे थे, किन्तु उनका धैर्य समाप्त नहीं हो रहा था । अन्तत: उनके प्रयत्न को सफलता मिल ही गयी ।


आदिनाथ जगनाथ हैं , रहते जग के माथ।
उन्हें नमन कर पाऊँ मैं, मोक्षपुरी तक साथ ॥

कैलासपर्वत के शिखर पर ठीक मध्यभाग में एक कमल निर्मित किया गया है । इस कमल में भगवान आदिनाथ की प्रतिमा विराजमान है । इस प्रतिमा का वर्ण मटमैला है । यह प्रतिमा खड्गासन में संस्थित है । यह प्रतिमा भूमितल से साठ फीट ऊँचाई पर विराजित है । इस प्रतिमा की अवगाहना इकतीस फीट की है । यह प्रतिमा यक्ष और यक्षिणी से समन्वित है । प्रतिमा की मुखमुद्रा दिव्य और भव्य है । इस प्रतिमा का वजन बीस टन है । अतिशय ऊँचाई पर स्थित होने के कारण यह प्रतिमा दूर-दूर से दिखाई देती है ।


स्तुति
वृत्तवीर्यादिबोधाढ्यं, सद्दर्शनगुणान्वितम्।
आदिनाथमहं वन्दे, भक्तिविद्याविवर्द्धये ॥

अर्थात् : वृत्तवीर्यादिबोधाढ्यम् चारित्र, वीर्य और ज्ञान से सुशोभित, सद्दर्शन-गुणान्वितम् सम्यग्दर्शनरुपी गुण से संयुक्त, आदिनाथम् आदिनाथ भगवान को मैं भक्तिविद्याविवर्द्धये भक्ति और ज्ञान का वर्द्धन करने के लिये वन्दे नमस्कार करता हूँ।


अर्घ्य
आत्मधर्म को पाने अपने, सुन्दर अर्घ्य सजा लाया ।
आदिनाथ की चरण-वन्दना, करने को मन ललचाया ।
भक्तिभाव को उर में धर कर, चरण-अर्पन करता हूँ ।
अष्टापद के आदिप्रभु के, शरणों के नित वरता हूँ॥

गजलक्ष्मी

परम पूज्य आचार्य श्री निश्चयसागर जी महाराज की सम्प्रेरणा से क्षेत्र पर गजलक्ष्मी का आगमन हुआ । क्षेत्र पर आने के उपरान्त गजलक्ष्मी धार्मिक संस्कारों से संस्कारित की गयी । प्रतिदिन प्रात:कालीन शुभ बेला में सर्वप्रथम गणधराचार्य श्री कुन्थुसागर जी महाराज उसे णमोकार महामंत्र सुनाते हैं । प्रतिदिन वह क्षेत्रस्थ समस्त जिनचैत्यालयों की वन्दना करती है । क्षेत्र पर विराजित सभी साधुगणों को वह प्रतिदिन नमस्कार करती है । जब किसी संघ का आगमन होता है, तब वह उन्हें लेने जाती है । विदाई की बेला में वह आगे रहती है । क्षेत्र पर जब कथी रथयात्रा आदि का आयोजन होता है, वह सबसे आगे लती है । क्षेत्र पर विराजित श्रमण-संघ उस पर आशीर्वाद की तथा श्रावकगण उस पर वात्सल्य की वर्षा करते हैं । श्रावकगण उसे प्रतिदिन प्रसाद भी खिलाते हैं ।

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