श्री कुन्थुगिरी

सम्मेदाचलपर्वत

पार्श्वनाथ कूट

जिनकी कृपाप्रसाद से, पूर्ण होत सब काम।
पार्श्वनाथ जिन को नमूँ, भक्तिसहित निशियाम ॥

इस कूट पर मार्बल से बना हुआ अठारह फीट चौड़ा, बीस फीट लम्बा व इकतालीस फीट ऊँचा जिनालय बना हुआ है । इस जिनालय में श्यामवर्णीय पाषाण से निर्मित पार्श्वनाथ भगवान की मनोज्ञ प्रतिमा विराजमान है । इस प्रतिमा में 11 फणों वाला सर्प है । यह प्रतिमा पद्मासन में विराजित है । यह प्रतिमा 11 फीट अवगाहना वाली है । यह प्रतिमा यक्ष-यक्षी और सिंहासन से सहित है।

स्तुति


सम्यक्कर्मोपदेष्टारं, त्रातारं भव्यदेहिनाम् । ज्ञातारं सर्वतत्त्वानां, पार्श्वनाथं नम्याम्यहम्।

अर्थात् : सम्यक्कर्मोपदेष्टारम् समीचीन क्रियाओं के उपदेष्टा, भव्यदेहिनाम् भव्य जीवों के त्रातारम् त्राता, सर्वतत्त्वानाम् सम्पूर्ण तत्त्वों के ज्ञातारम् ज्ञाता पार्श्वनाथम् पार्श्वनाथ भगवान को अहम् मैं नमामि नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य

जलगन्धाक्षत चरुवर दीपक, कुसुम धूप से भर थाली । फल से मिश्रित कर द्रव्यों को, पूज करे हैं गुणशाली ॥ कुन्थुगिरि के अजितकूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी । वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

नेमिनाथ कूट

धर्मचक्र धारण किया, बालब्रह्म भगवान ।
नेमिनाथ तव दास हूँ, करलूँ भव-अवसान ॥

इस कूट पर ऊँचे जिनालय के निर्माण का कार्य प्रगति पर है ।

इस कूट पर श्वेतवर्णीय पाषाण से निर्मित नेमिनाथ भगवान की मनोज्ञ प्रतिमा विराजमान है । यह प्रतिमा पद्मासन में विराजित है । इस प्रतिमा की अवगाहना 9 फीट है ।

स्तुति

नेमीशं त्रिजगन्नाथं, पापातङ्कविदारकम् पापरुपी आतंक के विदारक, नेमीशम् नेमिनाथ भगवान को अहम् मैं स्वचिदाप्तये स्वचिद्रूप की प्राप्ति के लिये मनसा मन से, वचसा वचन से और काया काया से नौमि नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य

रत्नथाल में अर्घ्य लेय शुभ, पूजा नित्य रचायेंगे ।
भक्तिभाव उर धर अविचल, मोक्षनगर को जायेंगे ॥
कुन्थुगिरि के नेमिकूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी ।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी

अजितनाथ कूट

भवशत्रु को जीत कर, पाया गुणभण्डार।
अजित जिनेश्वर को नमूँ, पाऊँ शिवपुरद्वार॥

अजितनाथ कूट
इस कूट पर श्यामवर्णीय पाषाण से निर्मित अजितनाथ भगवान की मनोज्ञ प्रतिमा विराजमान है । यह प्रतिमा खड्गासन में विराजित है । यह प्रतिमा 15 फीट उन्नत है ।

स्तुति

यमाराध्य शिवं प्राप्ता-भव्या जन्माब्धिनि:स्पृहा:।
भूतनाथं सु-भास्वन्तं, नौम्यहमजितं जिनम् ॥

अर्थात् : यम् जिसकी आराध्य आराधना करके जन्माब्धिनि:स्पृहा: भवसागर से निस्पृह भव्या: भव्य जीव शिवम् मोक्ष को प्राप्ता: प्राप्त हो चुके हैं, उन भूतनाथम् जीवों के स्वामी, सुभास्वन्तम् देदीप्यमान अजितम् अजितनाथ जिनम् भगवान को अहम् मैं नौमि नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य

जो भवि अष्ट द्रव्य ले कर में, मंगल पूज रचाते हैं ।
वे अपने भव-भव का अघमल, निश्चित तुरत खपाते हैं ॥
कुन्थुगिरि के अजितकूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी ।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

सुपार्श्वनाथ कूट

वीतरागी सर्वज्ञ प्रभु, अरिरजरहसविहीन ।
देव सुपारस को नमूँ, होकर चरणों लीन ॥

इस कूट पर श्यामवर्णीय पाषाण से निर्मित सुपार्श्वनाथ भगवान की अतिशय भव्य प्रतिमा विराजमान है । यह प्रतिमा खड्गासन में विराजित है । यह प्रतिमा की 15 फीट अवगाहना को धारण करने वाली है ।

स्तुति
केवलज्ञानसम्पन्नं, सर्वाभ्युदयमन्दिरम् । सुपार्श्वं विघ्नहन्तारं, वन्दे ज्ञानसुखाप्तये ॥

अर्थात् : केवलज्ञानसम्पन्नम् केवलज्ञान से सम्पन्न, सर्वाभ्युदयमन्दिरम् सम्पूर्ण अभ्युदय के मन्दिर, विघ्नहन्तारम् विघ्नों के हन्ता सुपार्श्वम् सुपार्श्वनाथ भगवान को मैं ज्ञान-सुखाप्तये ज्ञान और सुखों की प्राप्ति के लिये वन्दे वन्दन करता हूँ ।

अर्घ्य
जलगन्धादिक अष्टदव्य ले, पूजन जो नित करते है । अमल अचल निज स्वात्मद्रव्य का, निज स्वरुप वो करते हैं। कूट सुपारस का अतिसुन्दर, उस पर मनहारी । वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

विमलनाथ कूट

विमल ज्ञान दर्शन विमल, विमल वीर्य सुखकन्द ।
विमल जिनेश्वर को नमूँ, पाऊँ सौख्य अमन्द ॥

विमलनाथ कूट इस कूट पर रक्तवर्णीय पाषाण से निर्मित विमलनाथ भगवान की प्रतिमा खड्गासन में विराजित है । इस प्रतिमा की अवगाहना 9 फीट है । प्रतिमा का परिकर भी मनोज्ञ है । इस प्रतिमा के साथ यक्ष-यक्षी, धर्मचक्र, सिंहासन, छत्र और भामण्डल यह परिकर भी है ।

इस कूट पर विशाल जिनालय के निर्माण का कार्य प्रगति पर है ।

स्तुति
अज्ञानरसजापूर्णं, भूतले वारिदायितम् । विमलं विमलं नामि, ह्युशेषज्ञानशालिनम् ॥

अर्थात् : अज्ञानरसजापूर्णम् अज्ञानरुपी रज से आपूरित भूतले भूतल पर वारिदायितम् जल के समान, विमलम् निर्मल हि निश्चयत: अशेषज्ञानशालिनम् सम्पूर्ण ज्ञान के धारक विमलम् विमलनाथ भगवान को मैं नौमि नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य
नयनरम्य वसुद्रव्य लेय शुभ, पूजन जो नित करता है ।
सारे मंगल वह पाता है, दोषसंघ को हरता है ॥
कुन्थुगिरी के विमलकूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी॥

महावीर कूट

भवतमभंजक जगद्गुरु, महावीर भगवान ।
भक्तियुक्त वन्दन करूँ, करलूँ पातक हान ॥

महावीर कूट
इस कूट पर महावीर भगवान की प्रतिमा विराजमान है । खड्गासन में स्थित 18 फीट उन्नत इस प्रतिमा की निर्मिति मटमैले वर्ण वाले पाषाण से हुयी है । इस प्रतिमा के दर्शन नीचे से भी होते हैं ।

स्तुति
स्वाद्वादपविनिर्घातभिन्नकुवादिभूधरम् ।
नौम्यहं सन्मतिं नित्यं, शीलशैलेन्द्रशेखरम् ॥

अर्थात् : स्याद्वादपविनिर्घातभिन्नकुवादिभूधरम् स्याद्वदरुपी वघ्रजात के द्वारा जिन्होंने कुवादीरुपी पर्वतों का भेदन कर दिया है, उन शीलशैलेन्द्रशेखरम् शीलरुपी श्रेष्ठ पर्वत के शिखरस्वरुप सन्मातिम् महावीर भगवान को अहम् मैं नित्यम् नित्य नौमि नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य
जलगन्धादिक अष्टद्रव्य ले, पूजन जो नित करते हैं ।
अमल अचल निज स्वात्मद्रव्य का, निजस्वरुप को वरते हैं ॥
महावीर के श्रेष्ठ कूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी ।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

शान्तिनाथ कूट

पंचम चक्री लोक गुरु, बारहवें रतिनाथ ।
सोलहवें तीर्थेश को, नित्य नमाऊँ माथ ॥

इस कूट पर खड्गासन में अवस्थित, श्यामवर्णीय पाषाण से निर्मित शान्तिनाथ भगवान की सवा बारह फीट उन्नत प्रतिमा विराजमान है । इस कूट पर निालय का निर्माणकार्य प्रगतिपथ पर है ।

शान्तिनाथ कूट

स्तुति
यस्य सम्पूर्णविज्ञाने, लोकालोकं विपर्सति ।
तस्मै भी शान्तिनाथाय, भक्त्या नित्यं नमो नम: ॥

अर्थात् : यस्य जिसके सम्पूर्णविज्ञाने केवलज्ञान में लोकालोकम् लोक और अलोक विसर्पति प्रकाशित होते हैं, तस्मै उन श्री शान्तिनाथाय श्री शान्तिनाथ भगवान को मैं भक्त्या भक्तिपूर्वक नित्यम् नित्य नमो नम: पुन: पुन: नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य
अष्टद्रव्य का अर्घ्य बना कर, दिव्यार्चन को रचायेंगे ।
लोकोत्तम शाश्वत पद पाने, मोक्षपुरी को जायेंगे ।
कुन्थुगिरी के शान्तिकूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी ।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

सुमतिनाथ कूट

सुमतिप्रदायक सुमति प्रभु, हरो मतिज सब क्लेश ।
नमन करूँ पदद्वन्द्व में, पाऊँ सुगुण अशेष ॥

इस कूट पर सुमतिनाथ भगवान की-15 फीट उन्नत प्रतिमा विराजमान है । खड्गासन में अवस्थित इस प्रतिमा का निर्माण श्यामवर्णीय पाषाण से हुयी है ।

इस कूट पर जिनालय का निर्माणकार्य भी प्रगतिपथ पर है ।

स्तुति
सर्वज्ञं सर्वगं सार्वं, सुगतं सर्वसिद्धिदम् । शरण्यं सर्वभूतानां, सुमतिं प्रणमाम्यहं ॥

अर्थात् : सर्वज्ञम् सर्वज्ञ सर्वगम् सर्वग, सार्वम् सार्व, सुगतम् सुगत, सर्वसिद्धिदम् सम्पूर्ण सिद्धियों के प्रदायक, सर्वभूतानाम् सम्पूर्ण जीवों के लिये शरण्यम् शरणभूत सुमतिम् सुमतिनाथ भगवान को अहम् मैं प्रणमामि नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य
जलफल आठों द्रव्य लेय शुभ, उत्तम थाल सजा लाये ।
अर्घ्य चढ़ा कर मन-वच-तन से, हम शाश्वत पद को पाये ॥
कुन्थुगिरि के सुमतिकूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी ।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

धर्मनाथ कूट

धर्मनाथ की वन्दना, करते नित जो जीव ।
स्वात्मधर्म को प्राप्त कर, पावे सौख्य सढ़ीव ॥

इस कूट पर खड्गासन में अवस्थित 15 फीट ऊँची श्यामवर्णीय पाषाण में निर्मित धर्मनाथ भगवान की प्रतिमा विराजमान है ।

स्तुति
योगीगम्यं स्वयम्बुद्धमचिन्त्यचरितं शुभम् । सर्वभूतहितं देवं, धर्मनाथं नमाम्यहम् ॥

अर्थात् : योगीगम्यम् योगियों के द्वारा ज्ञेय, स्वयम्बुद्धम् स्वयम्बुद्ध, अचिन्त्यचरितम् अचिन्त्य चारित्र के धारक, शुभम् शुम, सर्वभूतहितम् सम्पूर्ण जीवों का हित करने वाले धर्मनाथम् धर्मनाथ देवम् भगवान को अहम् मैं नमामि नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य
वसुविधि प्रासुक द्रव्य लेय शुभ, रत्नथाल में भर लाये ।
अष्टम वसुधा पाने अब हम, दास चरण में है आये ॥
कुन्थुगिरि के धर्मकूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी ।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते है अविकारी ॥

गणधर कूट

वीरनाथ के चरण में, करता नित्य प्रणाम।
ज्ञान दर्श सुख वीर्य अरु, पावे अविचल स्थान ॥

इस कूट पर रक्तवर्णीय भगवान महावीर की मनोज्ञ प्रतिमा विराजमान है । यह प्रतिमा पद्मासन में विराजित है और इस प्रतिमा की अवगाहना 15 फीट है ।

प्रतिमा के समक्ष श्यामवर्णीय पाषाण में 61 इंच लम्बी और उतनी ही चौड़ी की गौतम गणधर की चरणपादुका है । इस कूट पर जिनालय का कार्य प्रगति पथ पर है ।

स्तुति
महावीरं महाधीरं, महाशीलं महागुरुम् ।
महाप्रतपतिं देव, प्रणमामि शिवाप्तये ॥

अर्थात् : महाधीरम् महाधीर, महाशीलम् महाशील, महावीरम् महावीर देवम् भगवान को मैं शिवाप्तये मोक्ष को प्राप्त करने के लिये प्रणमामि नमस्कार करता हूँ।

अर्घ्य
अष्टद्रव्य का थाल हाथ ले, पूजन नित ही करते जो ।
मद-मत्सर-मादायिक सारे, मन के कल्मष हरते वो ॥
गणधर कूट मनोहर अतिशय, उस पर प्रतिमा मनहारी ॥
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

कुन्थुनाथ कूट

कुन्थ्वादिक सब जीव पर, दया करे जो देव ।
कुन्थुनाथ को जो नमे, मेटे सर्व कुटेव ॥

इस कूट पर विराजमान कुन्थुनाथ भगवान की प्रतिमा विश्व में अद्वितीय है । लगभग 3 फीट ऊँची, 15 फीट चौड़ी और 15 फीट लम्बी वेदी पर लगभग 10 फीट ऊँची यह प्रतिमा है । पद्मासन में आसीन इस प्रतिमा का रंग मटमैला है । प्रतिमा की मुखकान्ति अत्यनत शान्त और मनमोहक है ।

सिंह की पीठ पर विराजित इस प्रतिमा में छत्र-चँवर-घण्टा-झारी-पंखा-ध्वजा-स्वस्तिक और दर्पण ये 8 मंगल द्रव्य, अशोकवृक्ष-सुरपुष्पवृष्टि-दुन्दुभिवाद्य, सिंहासन-छत्रत्रय-चमर-भामण्डल- दिव्यध्वनि ये 8 प्रातिहार्य, माता-पिता, यक्ष-यक्षी भी उत्कीर्ण हैं ।

नमिनाथ कूट

नमितसुरासुरनागनर, श्री सर्वज्ञ जिनेश ।
नमिजिन को नम भक्ति से, बन जाओ अखिलेश ॥

इस कूट पर एक अप्रतिम जिनालय बन रहा है ।

इस जिनालय में खड्गासनावस्था में श्यमावर्णीय पाषाण से निर्मित नमिनाथ भगवान की मनोज्ञ और विशाल प्रतिमा विराजमान है । यह प्रतिमा पन्द्रह फीट उन्नत है ।

स्तुति
अनन्यशरण: स्वामी, भव्याम्बुरुहभास्कर: ।
वीतसङ्गं जितानङ्गं, नमीशं प्रणमाम्यहम् ॥

अर्थात : अनन्यशरण: एकमात्र शरणभूत, स्वामी स्वामी, भव्याम्बुरुहभास्कर: भव्य- जीवरुपी कमलों को विकसित करने के लिये सूर्य, वीतसङ्गम् परिग्रह से रहित, जितानङ्गम् कामविजेता, नमीशम् नमिनाथ जिनेन्द्र को अहम् मैं प्रणमामि नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य
जलगन्धाक्षत आदि द्रव्य से, जो करते जिनवर-पूजा।
वे सारे अघ को हरते हैं, पाते ना फिर भवदूजा ॥
नमिजिन के इस दिव्य कूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी ।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

अरनाथ कूट

अरजिन अरिगण को करे, आत्मभूमि से दूर ।
निशदिन जो नमते उन्हें, पाते सुख भरपूर॥

इस पवित्र कूट पर अरनाथ भगवान की खड्गासन अवस्था में मटमैले वर्णीय पाषाण से निर्मित जिनप्रतिमा विराजमान है । इसकी ऊँचाई पन्द्रह फीट है । प्रतिमा के साथ यक्ष-यक्षी, सिंहासन, छत्र आदि भी हैं ।

स्तुति
क्लेशार्णवेऽपतत्सत्त्वदत्तहस्तावलम्बनम् ।
सर्वज्ञं देवदेवेशं, नमाम्यरं जिनं मुदा ।

अर्थात् : क्लेशार्णवे दु:खों के समुद्र में अपतत् गिरने वाले सत्त्वदत्तहस्तावलम्बनम् जीवों को जिन्होंने हस्तावलम्बन दिया है, उन सर्वज्ञम् सर्वज्ञ देवदेवेशम् देवाधिदेव अरम् अरनाथ जिनम् जिनेन्द्र को मैं मुदा प्रसन्नतापूर्वक नमामि नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य
प्रासुक उज्ज्वल अष्ट द्रव्य से, पूजा हम करते तेरी ।
सर्व पाप को दूर करेंगे, काटेंगे हम भवफेरी ।
अरजिन के इस दिव्य कूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी ।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

मल्लिनाथ कूट

मोहमल्ल का नाश कर, पाया अष्टम लोक ।
मल्लिनाथ को जो नमे, हरते सारे शोक ॥

मल्लिनाथ कूट
इस कूट पर श्यामवर्णीय 15 फीट उन्नत, बालब्रह्मचारी, मल्लिनाथ भगवान की मनोज्ञ प्रतिमा विराजमान है । यह प्रतिमा खड्गासन में अवस्थित है ।

स्तुति
मल्लिनाथं जगद्वन्द्यं, मोहमल्लविनाशकम् ।
काममल्लविनाशाय, वन्देऽहं तु पुन: पुन: ॥

अर्थात् : मोहमल्लविनाशकम् मोहरुपी मल्ल के विनाशक, जगद्वन्द्यम् जगत् में वन्दनीय, मल्लिनाथम् मल्लिनाथ भगवान को अहम् मैं काममल्लविनाशाय काममल्ल का विनाश करने के लिये पुन: पुन: पुन: पुन: वन्दे वन्दना करता हूँ ।

अर्घ्य
मोहमल्ल को मार भगाने, हम तव पूजन करते हैं ।
दिव्य लक्ष्मीधर बन कर प्रभुवर, मोक्षसम्पदा वरते हैं ।
कुन्थुगिरि के कुन्थुकूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी ।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

श्रेयांसनाथ कूट

श्रेयनाथ देते सदा, जगजीवों को श्रेय ।
उनके चरणों में नमूँ, पाऊँ आत्मिक प्रेय ॥

इस कूट पर श्यामवर्णीय पाषाण से तैयार की गयी श्रेयांसनाथ भगवान की प्रतिमा विराजमान है । इस प्रतिमा की अवगाहना पन्द्रह फीट है और यह प्रतिमा खड्गासन में प्रतिष्ठित है ।

स्तुति
ज्ञानलक्ष्मीसमाश्लेष-सर्वकल्याणमन्दिरम् ।
श्रेयनाथं सदा वन्दे, स्वात्मोपलब्धिहेतवे ॥

अर्थात् : ज्ञानलक्षमीसमाश्लेष ज्ञानरुपीलक्ष्मी से युक्त सर्वकल्याणमन्दिरम् सम्पूर्ण कल्याण के मन्दिर श्रेयनाथम् श्रेयांसनाथ भगवान को मैं स्वात्मोपलब्धिहेतवे स्वात्मा की उपलब्धि के हेतु से सदा सदैव वन्दे वन्दना करता हूँ ।

अर्घ्य
अष्ट द्रव्ययुत अर्घ्य लेय शुभ, पूजा करते अघहारी ।
वे भविजन भवसार तिरते, बन जाते शिवअधिकारी ॥
कुन्थुगिरी के श्रेयकूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी ।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते है अविकारी ॥

सुविधिनाथ कूट

मैं नित नमता भक्ति से, पुष्पदन्त मुनिनाथ ।
सविधि सुविधी प्राप्त करुँ, पहुँचूँ जग के माथ ॥

सुविधिनाथ कूट
इस कूट पर काले पाषाण से निर्मित सुविधिनाथ भगवान की विशाल प्रतिमा विराजमान है । यह प्रतिमा पद्मासन में विराजित है । इस प्रतिमा की अवगाहना 9 फीट है । इस कूट पर भव्य जिनालय का निर्माण भी हो रहा है ।

स्तुति
ज्ञानार्णवपय:पूर्णपवित्रितजगत्त्रयम् ।
दिव्यरुपधरं देवं, पुष्पदन्तं नमाम्यहम् ॥

अर्थात् : ज्ञानार्णवपय:पूर्णपवित्रितजगत्त्रयम् ज्ञानरुपी सागर के जल से जिन्होंने सम्पूर्ण लोकत्रय को पवित्रित कर दिया है, उस दिव्यरुपधरम् दिव्य रुप के धारक, देवम् देव पुष्पदन्तम् पुष्पदन्त को अहम् मैं नमामि नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य
पापप्रणाशक पुण्यप्रकाशक, जिनवर-अर्चन करते हैं ।
वे अतुलित शाश्वत सुख के स्थल, शिव में निजपद धरते हैं ।
कुन्थुगिरि के सुविधिकूट पर जिनप्रतिमा है मनहारी।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

पद्मप्रभू कूट

पद्मचिह्न चरणों लसे, पद्मकान्ति मनहार ।
नमन करे जो पद्म को, हो जाये भवपार ॥

इस कूट पर काले वर्ण वाले पाषाण से बनी हुयी पद्मप्रभ भगवान की प्रतिमा विराजमान है । चौदह फीट उन्नत यह जिनप्रतिमा खड्गासन में अवस्थित है । इस प्रतिमा के नीचे भव्य सिंहासन है ।

स्तुति
सर्वातिशयसम्पूर्णं, दिव्यलक्षणलक्षितम् ।
पद्मप्रभजिनं नौमि, स्वात्मतत्त्वोपलब्धये ॥

अर्थात् : सर्वातिशयसम्पूर्णम् सम्पूर्ण अतिशयों से युक्त, दिव्यलक्षलक्षितम् दिव्यलक्षणों से लक्षित, पद्मप्रभजिनम् पद्मप्रभ जिनेन्द्र को स्वात्मतत्त्वोपलब्धये स्वात्मतत्त्व की उपलब्धि के लिये मैं नौमि नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य
पद्मपत्र सम जीवन पाने, निशादिन अर्घ्य चढ़ाता हूँ।
सर्व कर्महर सर्व सुगुण धर, शाश्वत पद को पाता हूँ ॥
कुन्थुगिरि के पद्मकूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी ।
चन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

मुनिसुव्रतनाथ कूट

मुनिसुव्रत व्रतदान दे, हरो सकल भवक्लेश।
तव चरणों में जो नमे, बन जाता विश्वेश ॥

मुनिसुव्रतनाथ कूट
इस कूय पर खड्गासनावस्था में अवस्थित मुनिसुव्रतनाथ भगवान की प्रतिमा विराजमान है । यह प्रतिमा पन्द्रह फीट अवगाहना की धारक है । यह प्रतिमा रक्तवर्णीय पाषाण में अवस्थित है ।

स्तुति
विचित्रनयनिर्णीतजगजन्त्वैकबान्धवम् ।
भवज्ज्वलनशार्न्त्थं, वन्देऽहं मुनिसुव्रतम् ।

अर्थात् : विचित्रनयनिर्णीत अनेक नयों के ज्ञाता, जगजन्त्वैकबान्धवम् संसारवर्ती जीवों के एकमात्र बन्धु, मुनिसुव्रतम् भगवान मुनिसुव्रतनाथ को अहम् मैं भवज्ज्वलनशान्त्यर्थम् भवरुपी अग्नि की शान्ति के लिये वन्दे नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य
वसुकर्मो को दूर भगाने, वसुविध द्रव्य सजा लाये ।
भावभक्तियुत अर्चन करके, अतुलित सम्पद को पाये ॥
मुनिसुव्रत के श्रेष्ठ कूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी ।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

अभिनन्दननाथ कूट

अभिनन्दन वन्दन करूँ, दुष्टकर्म हो नाश ।
तव चरणों का ध्यान धर, पाऊँ आत्मप्रकाश ॥

अभिनन्दननाथ कूट
इस कूट पर लालपाषाण से बनी हुयी अभिनन्दननाथ भगवान की मूर्ति खड्गासन अवस्था में स्थापित है । इस मूर्ति के समीप कमलासन भी है । इस प्रतिमा की अवगाहना 15 फीट की है । प्रतिमा के साथ सिंहासन संलग्न है ।

स्तुति
अनन्तमहिमोपेतमजरं शान्तकल्मषम्।
सर्वेशं सर्वगं शुद्धं, वन्देऽहमभिनन्दनम् ॥

अर्थात् : अनन्तमहिमोपेतम् अनन्त महिमा से युक्त, अजरम् अजर, शान्तकल्मषम् कल्मषों की उपशान्ति को प्राप्त सर्वेशम् सर्वेश, सर्वगम् सर्वग, शुद्धम् शुद्ध, अभिनन्दनम् भगवान अभिनन्दननाथ को अहम् मैं वन्दे नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य
अभिनन्दन की पूजन करने, स्वर्णथाल भर लाये हैं ।
वसुकर्मों का नाश करे हम, भाव यही मन भाये हैं ॥
अभिनन्दन के दिव्य कूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी ।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

वासुपूज्य कूट

वासुपूज्य तुमको सदा, वासव-इन्द्र नमन्त ।
सिर धर तेरी चरणरज, बन जाऊँ शिवकन्त ॥

इस कूट पर प्रथम बाल-ब्रह्मचारी, वासुपूज्य भगवान वासुपूज्य भगवान की पद्मासन मुद्रा में स्थित रक्तवर्णीय प्रतिमा विराजमान है । यह प्रतिमा सुन्दर कुन्तलों से संयुक्त है । इस प्रतिमा की ऊँचाइ सवा 8 फीट की है । उपवन के मध्य में यह प्रतिमा विराजमान है । अत: इसकी दिव्यता में अधिक श्रीवृद्धि हुयी है ।

स्तुति
हरीन्द्रविष्ठपारुढं, कर्मसङ्घातघातकम् ।
वासुपूज्यजिनेन्द्राय, नमो नित्यं पुन: पुन: ॥

अर्थात् : हरीन्द्रविष्ठपारुढम् सिंहासन पर आरुढ़, कर्मसङ्घातघातकम् कर्मसमूह के विनाशक, वासुपूज्यजिनेन्द्राय वासुपूज्य जिनेन्द्र को पुन: पुन: पुन: पुन: नित्यम् नित्य नमो नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य
वासुपूज्य की पूजन करते, आत्मिक वसुगुण पाने को ।
द्रव्य भाव अरु नोकर्मों को, जड़ से शीघ्र खपाने को ॥
वासुपूज्य के दिव्य कूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी ।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

सम्भवनाथ कूट

सम्भव की पदवन्दना, करती सम्भव काज ।
भवभ्रम का भय दूर कर, भक्त बने शिवराज ॥

इस कूट पर सम्भवनाथ भगवान की लालवर्णीय पाषाण से निर्मित भव्य प्रतिमा स्थापित है । इस प्रतिमा की अवगाहना पन्द्रह फीट की है । यह विशाल प्रतिमा खड्गासन में संस्थित है । इस कूट पर भव्य जिनालय का निर्माण प्रगति पर है ।

स्तुति
ध्वस्तकर्मारिसन्तानं, मुक्तिलक्ष्मीकटाक्षितम् ।
सम्भवं शिरसा वन्दे, महामोहोपशान्तये ॥

अर्थात् : ध्वस्तकर्मारिसन्तानम् कर्मरुपी शत्रुओं की सन्तति के विनाशक, मुक्तिलक्ष्मी-कटाक्षितम् मुक्तिरुपी लक्ष्मी के कटाक्ष को देखने वाले सम्भवम् सम्भवनाथ को महामोहोपशान्तये महामोह की उपशान्ति के लिये शिरसा मस्तक नवाँ कर वन्दे नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य
सम्भव करने आत्मिक कारज, श्रेष्ठ अर्घ्य हम ले आये ।
अष्टम वसुधा पाने भगवन्, चरणकमल तेरे ध्याये ॥
सम्भवजिन के श्रेष्ठ कूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी ।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

अनन्तनाथ कूट

अन्तातीत धरे सुगुण, घातिकर्म कर नाश ।
देव अनन्त सदा नमूँ, पाऊँ ज्ञानप्रकाश ॥

इस कूट पर रक्तवर्णीय पाषाण से निर्मित भगवान अनन्तनाथ की दिव्य छबि से युक्त, विशालकाय खड्गासनासीन मनोज्ञ प्रतिमा विराजमान है । इस प्रतिमा की अवगाहना 15 फीट है ।

स्तुति
अनन्तज्ञानसम्पूर्णं, ह्युतन्तसुखसंयुतम् ।
अनन्तं शिरसा वन्दे, ह्युनन्तगुणप्राप्तये ॥

अर्थात् : ही निश्चय से अनन्तज्ञानसम्पूर्णम् अनन्त ज्ञान से परिपूर्ण, अनन्तसुख-संयुतम् अनन्त सुख से संयुक्त अनन्तम् अनन्तनाथ भगवान को अनन्तगुण-प्राप्तये अनन्त गुणों की प्राप्ति के लिये शिरसा मस्तक नवाँ कर वन्दे नमस्कार करता हूँ।

अर्घ्य
गुण अनन्त को पाने भगवन्, दोष अनन्त मिटाने को ।
अष्टद्रव्य से पूजन करलूँ, स्वस्वरुप को पाने को ॥
अनन्तजिन के श्रेष्ठ कूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी ।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी

शीतलनाथ कूट

शीतलता देते सदा, करके भव का अन्त।
शीतलप्रभु को नमन करुँ, बन जाऊँ अरिहन्त ॥

इस कूट पर लालपाषाण से निर्मित शीतलनाथ भगवान की खड्गासन मुद्रा में स्थित अत्यन्त मनमोहक भव्य जिनप्रतिमा विराजमान है । यह प्रतिमा पन्द्रह फीट उन्नत है ।

स्तुति
यं स्मरन्त्यनिशं भव्या-मुक्तिश्रीसङ्गमोत्सुका:।
तं शीतलं जगन्नाथं, नमामि स्वहिताप्तये ॥

अर्थात् : मुक्तिश्रीसङ्गमोत्सुका: मुक्तिरुपी लक्ष्मी के साथ संगम करने के इच्छुक भव्या: भव्य जीव यम् जिसका अनिशम् नित्य सेवान्ति सेवन करते हैं, तम् उन जगन्नाथम् जगन्नाथ शीतलम् शीतलनाथ को मैं स्वहिताप्तये अपने हित की प्राप्ति के लिये नमामि नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य
शीतलता पाने जिनवर मैं, तव चरणों को ध्याता हूँ ।
पूजन करके निशदिन तेरी, शान्तिसुधारस पीता हूँ ॥
शीतलकूट मनोहर अतिशय, उस पर जिनप्रतिमा न्यारी ।
उसका वन्दन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

आदिनाथ कूट

वृषभचिह्नयुत वृषभप्रभु, महावृषभ अवतार ।
वृषगुण पाने नमन करूँ, शान्त दान्त अविकार ॥

इस कूट पर लाल वर्ण वाले पाषाण से बनी हुयी प्रथम तीर्थंकर, आदिनाथ भगवान की मनोज्ञ प्रतिमा विराजमान है । खड्गासन में विराजित इस प्रतिमा की ऊँचाई इक्कीस फीट है ।

इस प्रतिमा की स्थापना प्राकृतिक लघुकाय टेकरी पर की गयी है ।

स्तुति
दिव्यरुपसमायुक्तं कल्याणमहिमालयम् ।
सर्वातिशयसंयुक्तमादिनाथं नमाम्यहम् ॥

अर्थात् : दिव्यरुपसमायुक्तम् दिव्यरुप से सहित कल्याणमहिमालयम् कल्याण की महिमा के घर, सर्वातिशसंयुक्तम् सम्पूर्ण अतिशयों से सहित आदिनाथम् आदिनाथ भगवान को अहम् मैं नमामि नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य
वृष्यभाव नश जाये मेरा, मैं सुवृष को पा जाऊँ ।
इसी हेतू से आदिनाथ के, चरणकमल को मैं ध्याऊँ॥
वृषभकूट है अतिशय मनहर, उस पर जिनप्रतिमा न्यारी ।
आदिनाथ का वन्दन करके, भवि बनते हैं अविकारी ॥

चन्द्रप्रभ कूट

अष्टम वसुधा जिन लही, अष्टकर्म कर नाश ।
अष्टम जिनवर को नमूँ, नाशूँ भव का पाश ॥

इस कूट पर मटमैले पाषाण से निर्मित चन्द्रप्रभ भगवान की भव्य प्रतिमा विराजमान है । यह प्रतिमा खड्गासन में विराजित है । इस प्रतिमा की अवगाहना पच्चीस फीट है ।

इस प्रतिमा के साथ सिंहपीठ, सर्वाह्नयक्ष, और सानत्कुमार, श्रीदेवी और श्रुतदेवी, चामरधारी यक्ष, भामण्ड, कल्प-वृक्ष, छत्र, सिंह और विविध चित्र सुसज्जित है ।

स्तुति
अज्ञानतिमिरं हत्वा, योऽभवज्ज्ञाननायक: ।
चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय, त्रियोगेन नमाम्यहम् ॥

अर्थात् : अज्ञानतिमिरम् अज्ञानरुपी अन्धकार का हत्वा विनाश करके य: जो ज्ञाननायक: ज्ञाननायक अभवत् हुये, उन अहम् मैं चन्द्रपभजिनेन्द्राय चन्द्रप्रभ जिनेन्द्र को त्रियोगेन तीन योगों सें नमामि नमस्कार करता हूँ ।

अर्घ्य
चन्द्रकान्ति सम उज्ज्वल जिनगुण, पाने जिनगुण यजता हूँ ।
स्वात्मलाभ हो मुझको भगवन्, यही भाव धर भजता हूँ ॥
कुन्थुगिरि के चन्द्रकूट पर, जिनप्रतिमा है मनहारी ।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

जलमन्दिर

विघ्नहरण मंगलकरण, विघ्नहार जिनराज ।
पार्श्वनाथ को नमन करो, बनो जगत सिरताज ॥

इस कूट पर श्यामवर्णीय पाषाणखण्ड से निर्मित पार्श्वनाथ भगवान की मनोज्ञ प्रतिमा विराजमान है । इस प्रतिमा में उन्नीस फणों वाला सर्प है । यह प्रतिमा पद्मासन में विराजित है । यह प्रतिमा नौ फीट उन्नत है । प्रतिमा के साथ सिंहासन भी है ।

स्तुति
स्त्युत्यं त्रिदशयोगीन्द्रै:, वन्द्यं वन्द्यजनेष्वपि ।
नमामि शीलशैलेशं, पार्श्वनाथं निरन्तरम् ॥

अर्थात् : त्रिदशयोगीन्द्रै : देवेन्द्र और योगीन्द्रों के द्वारा स्तुत्यम स्त्युत्य, वन्द्यजनेषु वन्दनीय मनुष्यों में अपि भी वन्द्यम् वन्द्य, शीलशैलेशम् शीलरुपी पर्वत के स्वामी पार्श्वनाथम् पार्श्वनाथ भगवान को निरन्तरम् निरन्तर नमामि नमस्कार करता हूँ।

अर्घ्य
सम्यग्दर्शनज्ञानचरण को, पाने मैं नित यजता हूँ ।
मोक्षसुखामृत पीने निशदिन, जिनचरणों को भजता हूँ ॥
कुन्थुगिरी के जलमन्दिर में, जिनप्रतिमा है मनहारी ।
वन्दन पूजन करके भविजन, बन जाते हैं अविकारी ॥

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