श्री कुन्थुगिरी

गुरुपरिचय

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गणधराचार्य कुन्थुसागर

मेरी भावना

बहता पानी और रमता जोगी, यही समीचीन नीति है । 1967 में परम पूज्य अष्टादशभाषाभाषी, आचार्यश्री महावीरकीर्ति जी महाराज से मुनिदीक्षा को प्राप्त कर मैंने लगभग सम्पूर्ण भारत में विहार किया । वर्तमान में बढ़ते शहरीकरण के कारण साधुओं की निर्दोषचर्या का परिपालन कठिनतापूर्वक हो पा रहा है । विशेषरुप से वयोवृध्द त्यागियों की साधना में अधिकतम व्यवधान उत्पन्न हो रहे हैं । उनकी साधना अव्याबाध हो-इसी भाव से मैंने एक क्षेत्र की संकल्पना की थी । भक्तों ने तथा महादेवी माता पद्मावती ने मेरी संकल्पना को न केवल मूर्तरुप दिया, अपितु उसे विराट रुप भी दिया ।

बारह वर्षों की अल्पावधि में एक तीव्रगति से विकासशील क्षेत्र का निर्माण हुआ । कुन्थुगिरि नामक इस क्षेत्र की विकासयात्रा को देख कर मन अतिाय सन्ुष्ठ है । वयोवृध्द साधुओं के लिये यह तीर्थ श्रेष्ठ साधनास्थल के रुप में जाना जा सकता है । अध्ययनशील साधुओं के लिये भी यह क्षेत्र सहयोगी बन सकता है, क्योंकि क्षेत्र पर स्थित आगममन्दिर में लगभग पाँच/सात हजार ग्रन्थ उपलब्ध हैं । ईसवी सन 2013 में चतुर्थ-पट्टाधीश, आचार्यश्री सुविधिसागर जी महाराज ने इस क्षेत्र पर वर्षायोग सम्पन्न किया । भाद्रपद शुक्ला प्रतिपदा के दिन दैवसिक प्रतिक्रमण सम्पन्न होने के उपरान्त उन्होंने मुझसे प्रश्न किया कि कुन्थुगिरि के विषय में हमें ऐतिहासिक जानकारी दीजिये । उनके निवेदन को स्वीकार कर मैंने उन्हें क्रम से एक-एक जिनालय का विवरण सुनाया । उसी को आधार बना कर तथा स्वयं क्षेत्र के दर्शन कर उन्होंने आधुनिक शैली में श्री कुन्थुगिरि-दर्शन नामक कृति की रचना की है । यह कृति तीर्थयाचित्रयों को मार्गदर्शन करने में सफल होगी-ऐसा मुझे विश्वास है । कृतिकार को मेरा प्रतिनमोऽस्तु पूर्वक समाधिवृद्धिरस्तु-आशीर्वाद । समस्त सहयोगियों को भी मेरा पुन: पुन: आशीर्वाद । क्षेत्र के ट्रस्टीगण और दानदाताओं को हमारा बहुत-बहुत आशीर्वाद।

आचार्यश्री देवनन्दी जी महाराज

हमारे मार्गदर्शक

विगत दो हजार वर्षों में आर्षपरम्परा को संरक्षण प्रदान करने वाले अनेक आचार्य-परमेष्ठी हुये। उन प्रभावक आचार्यों के कारण । ही जिनशासन की प्रभावना होती रही। उन्होंने अपनी साधना, साहित्यरचना और श्रेष्ठ व्यक्तित्व के द्वारा जिन शासन के गौरव को बढ़ाया है।

वर्तमान में भी ऐसे अनेक आचार्य हैं, जिनके प्रयत्न से जिनधर्म संरक्षित है। उनमें एक नाम है-परम पूज्य आचार्यश्री देवनन्दी जी महाराज ।

परम पूज्य प्रज्ञाश्रमण, सारस्वताचार्य श्री देवनन्दी जी महाराज कुशल मार्गदर्शक हैं। परम पूज्य गणाधिपति, गणधराचार्यश्री कुन्थुसागर जी महाराज के प्रिय शिष्य, आचार्यश्री देवनन्दी जी महाराज महान प्रभावक हैं। कुन्थुगिरि में अब तक दो पंचकल्याणक सम्पन्न हो चुके हैं। ईसवी सन 2005 में पहली बार पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सम्पन्न हुयी। ईसवी सन 2013 में दूसरी बार पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सम्पन्न हुयी। दोनों ही पंचकल्याणक विश्वस्तर पर जिनशासन की प्रभावना में कारण बनी। गुरुदेव दोनों ही पंचकल्याणक में आपको निर्देशक बनाया। साधुओं के आवागमन की व्यवस्था से लेकर विधिविधान के समस्त कार्यों में आपने जो मार्गदर्शन प्रदान किया, उसी के कारण उन प्रतिष्ठाओं में आशातीत सफलतायें प्राप्त हुयी। गुरुदेव ने आपकी पात्रता को विलोक कर ही आपको अपना उत्तराधिकारी घोषित किया है।

इस क्षेत्र को आपके मार्गदर्शन और आशीर्वाद की महति आवश्यकता है। आप निरन्तर इस क्षेत्र के विकास में अपना मार्गदर्शन और आशीर्वाद प्रप्रदान करते रहेंगे-ऐसा हमें विश्वास है। क्षेत्र कमेटी पूज्यवर के श्रीचरणों में हमारा भक्तिपूर्वक पुनः पुनः नमोऽस्तु॥

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श्री क्षेत्र कुन्थुगिरी:

श्री गणाधिपति गणधराचार्य विद्या शोध संस्थान
हातकणगले-रामलिंग रोड ,
श्री क्षेत्र कुन्थुगिरी, आळते.416109
ता.हातकणगले जि. कोल्हापूर(महाराष्ट्र)

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