श्री कुन्थुगिरी

भवन

आचार्य भवन

आचार्य श्री महावीरकीर्ति

आचार्य भवन

परम पूज्य गणधराचार्यश्री कुन्थुसागर जी महाराज का वर्तमान निवास इसी भवन में है । इस भवन में पाँच कमरे और एक हॉल है । यह वही हॉल है, जहाँ पर दर्शनार्थी गुरुदर्शन करते हैं, समस्याओं से पीड़ित भक्तगण अपनी समस्याओं का समाधान पाने के लिये बैठते हैं और साधुगण गुरुचरणों में अपने आवश्यकों की पूर्ति करने के लिये विराजते हैं ।

इस भवन के मध्यवर्ती कमरे में परम पूज्य गणधराचार्यश्री कुन्थुसागर जी महाराज का संघीय चैत्यालय विराजमान है। गुरुदेव की समाधि के उपरान्त जब से आचार्यश्री ने स्वतन्त्ररुप से विहार किया, तब से ही यह चैत्यालय उनके साथ है ।

इस चैत्यालय में अष्टधातुमयी पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा है । यह ग्यारह इंच उन्नत है । इस प्रतिमा के साथ भगवान चन्द्रप्रभ, भगवान शान्तिनाथ, भगवान महावीर की प्रतिमायें विराजमान है । परम पूज्य आचार्यश्री महावीरकीर्ति जी महाराज की चरणपादुका इस चैत्यालय में स्थापित है । इस चैत्यालय में ऋषिमण्डल, कलिकुण्ड पार्श्वनाथ, सिद्धचक्र आदि अनेक प्रकार के यन्त्र भी विराजमान हैं । इसी चैत्यालय में भगवान की वेदी के समक्ष महादेवी पद्मावती की प्रतिमा विराजमान है । भक्तगणों में इस प्रतिमा के प्रतिमा के प्रति अपार श्रद्धाभाव है । प्राय: संघ से जुड़े हुये लोक क्षेत्र पर आने के उपरान्त इस प्रतिमा की आराधना अवश्यक करते हैं ।


आचार्यश्री विमलसागर

आचार्य भवन

त्यागियों की सुव्यवस्थित व्यवस्था करने के लिये कुन्थुगिरि क्षेत्र पर अनेक प्रकार की व्यवस्था की गयी है । उनमें से यह आवास-व्यवस्था का स्थल है । यह भवन दुमंजिला है । नीचले मंजिल में चार कमरे हैं । उन कमरों के आगे एक विशाल हॉल है । हॉल के सामने दालान है । दूसरे मंजिल पर दो कमरे हैं। उन कमरों के सामने छत है।

इन सभी कमरों में साधुओं के योग्य और आगम के अनुकूल व्यवस्था है । यह भवन यात्रिओं के आवागमनस्थल से दूर एकान्त में है । यही कारण है कि इसमें अपार शान्ति है ।

भवन के एक ओर कैलासपर्वत की ओर जाता हुआ रस्ता है, सामने छोटा-सा बगीचा है । आगे-पीछे भी हरियाली फैली हुयी है । इस प्रकार यह भवन प्रकृति की गोद में बसा हुआ है। यहाँ रह कर साधु अपनी साधना को अग्रगति प्रदान कर सकता है ।

आर.के.भवन

तीर्थक्षेत्र कमेटी के भूतपूर्व अध्यक्ष श्री आर.के.जैन के द्वारा निर्मित होने से इस भवन को यही नाम दिया गया है । इस भवन में दो कमरे और एक हॉल है । प्राय: बाहर से आने वाले चौके यहाँ लगते हैं अथवा विशिष्ठ अतिथियों को इस भवन में ठहराया जाता है।

अन्नपूर्णा भवन

पद्मावती

अन्नपूर्णा भवन

यात्रियों की भोजनसुविधा के लिये इस क्षेत्र पर पद्मावती अन्नपूर्णा भवन का निर्माण किया गया है । इस भवन में यात्रियों को सशुल्क भोजन दिया जाता है । भोजन की व्यवस्था उत्तम है ।

यह भवन दो मंजिला है । यदि यात्री कम हो तो नीचे की मंजिल पर ही भोजन कराया जाता है । किन्तु, यदि यात्री अधिक हो तो उन्हें उपरिम मंजिल पर भोजन कराया जाता है । इस मंजिल पर विशालकाय दो कक्ष हैं ।

अति विशेष
इस क्षेत्र पर आचार्यश्री विद्यानन्दी जी महाराज के एलाचार्य और आचार्यपद के संस्कार हुये । इस क्षेत्र पर आचार्यश्री नमिसागर जी महाराज और आचार्यश्री वैराग्यनन्दी जी महाराज के भी आचार्यपदसंस्कार हुये । इस क्षेत्र पर बीस से अधिक दीक्षायें सम्पन्न हो चुकी हैं ।

गणधराचार्यश्री के अतिरिक्त अन्य आचार्य-परमेष्ठियों ने भी (आचार्यश्री पद्मनन्दी जी महाराज, आचार्यश्री सिद्धान्तसागर जी महाराज आदि) दीक्षासंस्कार किये हैं । गणिनी-आर्यिकाश्री सुविधिमती माताजी के कर-कमलों से भी एक दीक्षा सम्पन्न हो चुकी है ।

सभा भवन

किसी भी क्षेत्र पर धार्मिक और मांगलिक कार्यो को सम्पन्न करने के लिये सभाभवन की आवश्यकता होती है । इसकी पूर्ति यह भवन करता है ।

यह भवन सत्तर फीट लम्बा और चालीस फीट चौड़ा है । भवन की सुन्दरता को बढ़ाने के लिये इसे चारों ओर से वृक्षों से वेष्टित किया गया है । सभाभवन में तीस फीट लम्बा बीस फीट चौड़ा और ढाई फीट ऊँचा मंच तैयार किया हुआ है । इसमें दीक्षाओं जैसे धार्मिक, धार्मिक प्रतियोगिताओं जैसे सांस्कृतिक, विविध शिबिर, विवाह जैसे गार्हस्थिक कार्यक्रम इस सभाभवन में सम्पन्न होते हैं । क्षेत्र के द्वारा प्राप्त होने वाली व्यवस्थाओं के कारण जैन ही क्या? अजैन भी इस भवन का उपयोग करते हैं।

साहित्य - प्रकाशन
किसी भी क्षेत्र का मूल्य तब और भी बढ़ जाता है, जब वह क्षेत्र साहित्य और संस्कृति का भी संरक्षक बनता है । इस विषय में इस क्षेत्र का स्थान अग्रणी है । आर्षपरम्परा का संरक्षण करने के लिये यहाँ अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है । साथ ही आर्ष-परम्परा का पोषण करने वाला साहित्य भी प्रकाशित कराया जाता है । इस क्षेत्र के द्वारा अनेक पुस्तकों का प्रकाशन कराया गया है । वे पुस्तकें यहाँ विक्री के लिये भी उपलब्ध हैं ।

त्यागी आश्रम

आचार्यश्री आदिसागर वयोवृद्धमुनि

इस आश्रम की दो मंजिले हैं । नीचे नौ कमरे और एक सभाभवन है । इस सभाभवन में त्यागीगण प्रतिक्रमण, स्वाध्याय आदि आवश्यकों की पूर्ति करते हैं । नीचे के नौ कमरों में मुनियों के आवास की व्यवस्था है ।

ऊपरी मंजिल में भी नौ कमरे हैं । उनमें श्रमणियों के आवास की व्यवस्था है । त्यागियों के अठारह कमरों में शास्त्रादि रखने के लिये कपाट बनाये हुये हैं । त्यागियों के शयन के लिये पाटे, पढ़ने आदि के लिये चौकियाँ आदि की उत्तम व्यवस्था प्रत्येक कमरे में की गयी है ।

विशेष बात यह है कि इन कमरों को पिच्छिधारकों के अतिरिक्त किसी को भी नहीं दिया जाता । क्षेत्र पर कितने ही यात्री क्यों न आये, उनसे साधुओं के आवश्यकों में कहीं व्यवधान उत्पन्न न हो सके, इसका विचार करके एकान्त में ही इस आश्रम का निर्माण किया गया है । वसतिका के समीप ही साधुओं के नीहार की व्यवस्था है । यही कारण है कि इस क्षेत्र पर वयोवृध्द श्रमण-श्रमणियाँ निर्विकल्प होकर अपनी आत्मसाधना कर सकती है ।

निषेधिका

साधुओं के पार्थिव शरीर के अग्निसंस्कार की क्रीया जिस स्थान पर सम्पन्न होती है, उसे निषेधिका कहते हैं । आचार्यों ने निषेधिका को पूज्य माना है । यतिगण उसकी सविधि वन्दना करते है । आचार्यश्री शिवार्य जी महाराज ने लिखा है -

समणाणं ठिदिकप्पो वासावासे तहेव उड्डबंधे।
पडिलिहिदव्वा णियमा णिसीहिया सव्वसाधूहिं ॥
(भगवती आराधना = 1961)

अर्थात् : वर्षाऋतु के चार माह में एक स्थान पर वास आरम्भ करते समय और ऋतुओं के आरम्भ में सब साधुओं को नियम से निषेधिका की प्रतिलेखना करनी चाहिये । यह साधुओं का स्थितिकल्प है ।


निषेधिका क्षपक की वसतिका से पश्चिम-दक्षिण दिशा में, दक्षिण दिशा में अथवा पश्चिम दिशा में होनी चाहिये । कुन्थुगिरि में स्थित निषेधिका पश्चिम-दक्षिण दिशा में संस्थित है ।

ईसवी सन् 2002 से 2013 तक यहाँ सोलह साधुओं का अन्तिम संस्कार सम्पन्न हुआ है इन सोलह साधुओं के नाम क्रम से इस प्रकार हैं -

परम पूज्य एलाचार्यश्री वीरनन्दी जी महाराज, परम पूज्य मुनिश्री क्षेमंकरनन्दी जी महाराज, परम पूज्य मुनिश्री कामविजयनन्दी जी महाराज, परम पूज्य मुनिश्री शिवनन्दी जी महाराज, परम पूज्य मुनिश्री अनन्तकीर्ति जी महाराज, परम पूज्य मुनिश्री निश्चयनन्दी जी महाराज, परम पूज्य मुनिश्री अजयसागर जी महाराज, परम पूज्य मुनिश्री कवीन्द्रनन्दी जी महाराज, पूज्या आर्यिकाश्री अरुपश्री जी माताजी, आर्यिकाश्री अपूर्वश्री जी माताजी, आर्यिकाश्री सुविधामती माताजी, पूज्य क्षुल्लकश्री आनन्दकीर्ति जी महाराज, पूज्य क्षुल्लकश्री सुशीलकीर्ति जी महाराज, पूज्या क्षुल्लिकाश्री शीतलमती माताजी, पूज्य क्षुल्लिकाश्री कनकश्री माताजी और पूज्या क्षुल्लिकाश्री पद्मश्री माताजी ।

सभी का अग्निसंस्कार एक ही स्थान पर किया गया । तदुपरान्त चरणछत्रियों में उनकी चरणपादुकायें विराजमान की गयी । विशेष बात यह है कि अधिकांश अग्निसंस्कार आगम की मर्यादा के अनुकूल सल्लेखना होते ही उसी प्रहर में किये गये

दानशाला

इस क्षेत्र की सर्वप्रमुख विशेषता यह है कि इस क्षेत्र पर बीसवीं शताब्दी के पाँच प्रमुख आचार्य अर्थात् परम पूज्य आचार्यश्री आदिसागर जी महाराज (अंकलीकर), परम पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागर जी महाराज (दक्षिण), आचार्यश्री महावीरकीर्ति जी महाराज, आचार्यश्री विमलसागर जी महाराज और आचार्यश्री सन्मतिसागर जी महाराज के नाम पर विशालकाय एक-एक भवन है ।

इन पाँच भवनों में एक भवन है, जिसे दानशाला यह नाम दिया गया है । यह दानशाला परम पूज्य चारित्र-चक्रवर्ती, आचार्यश्री शान्तिसागर जी महाराज को समर्पित की गयी है । इस भवन में चार कमरे हैं । इनमे से पहले कमरे में शुद्ध भोजन की अर्थात् चौके की सामग्री तैयार की जाती है । यात्रियों के आने पर उनके लिये शुद्ध वस्त्रों की व्यवस्था एक कमरें में की गयी है । एक कमरे में सामन रखा जाता है और एक कमरा प्राय: खाली ही रखा जाता है । इन चारों कमरों के आगे एक विशाल हॉल है । इस हॉल में त्यागियों के और व्रतियों के आहार की क्रिया सम्पन्न होती है । एक साथ चालीस साधुओं का आहार सम्पन्न हो सके- इतनी व्यवस्था इस हॉल में है । प्राय: इस क्षेत्र पर रहने वाले साधु वयोवृद्ध हैं । अत: उनके प्रकृति के अनुकूल तथा वातावरण के अनुकूल आहार की व्यवस्था करने की अतिशय आवश्कयता है । यह ध्यान में रख कर ही यहाँ आहारव्यवस्था बनायी गयी है । विशेष बात यह है कि संघ के भक्त-परिवार अपनी ओर से इस व्यवस्था को संचालित करते हैं । वर्तमान में चौके की व्यवस्था संघस्थ ब्रह्मचारिणी हीराबाई (भुवाजी), ब्रह्मचारिणी जयश्री दीदी और ब्रह्मचारिणी पूनम दीदी सम्भाल रही है ।

नवागन्तुक साधुओं को भी संघीय व्यवस्था लेकर क्षेत्र पर नहीं आना पड़ता । क्षेत्र पर उनके अनुकूल व्यवस्था को जाती है ।

उपवन

पर्यावरणीय शुद्धि को कायम रखने के लिये तथा क्षेत्रीय सुन्दरता का अभिवर्द्धन करने के लिये क्षेत्र पर अनेक छोटे-छोटे उपवन बनाये गये हैं । आचार्यश्री महावीरकीर्ति भवन के सम्मुख बनाया गया उपवन उन सभी का प्रतिनिधि है । इस उपवन के आरम्भ में पार्श्वनाथ की कृत्रिम टूक बनायी गयी है । कृत्रिम पर्वत के ऊपर पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा विराजित की गयी है । यह प्रतिमा केवल दर्शनीय है ।

उपवन में यात्रियों को बैठने के लिये अनेक कुर्सियों को रखा गया है । यह कुर्सियाँ सिमेण्ट की बनायी हुयी हैं । इस उपवन में बच्चों को खेलने के लिये अनेक संसाधन निर्मित किये गये हैं ।

अन्य उपवनों मे अनेक प्रकार की औषधीय वनस्पतियों का संरक्षण किया जा रहा है । अनेक प्रकार के आम्रवृक्ष, कदलीवृक्ष, अन्य प्रकार के फलों के वृक्ष, पुष्पों के वृक्ष आदि वृक्षों से ये उपवन सजे हुये हैं । वैजयन्ती और रुद्राक्ष के वृक्ष भी इन उपवनों को सुशोभित कर रहे हैं ।

विशेष बात यह है कि आम्रवृक्ष पर लगने वाले फल स्वतन्त्र-स्वतन्त्र होते हैं । किन्तु, इस क्षेत्र पर एक ऐसा भी आम्रवृक्ष है, जिस पर आम्रफल के गुच्छे लगते हैं । इस क्षेत्र पर उत्पन्न हुये फल भक्तों में प्रसाद के रुप में वितरीत किये जाते हैं ।

श्री कुन्थुगिरी संपर्क

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