श्री कुन्थुगिरी

आरती संग्रह

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गुरुपूजन

स्थापना - (छन्द = शुद्धगीता)
कुन्थुसागर मुनीश्वर की, करूँ मैं भाव से पूजा ।
तिरूँगा पापसागर से, नहीं लूँगा जनम दूजा ॥
सूरीश्वर आपकी अर्चा, हमें भव से तिरायेगी ।
सभी मानस समस्यायें, शमन तत्क्षण करायेगी ॥

ॐ ह्रूँ गणाधिपति, गणधराचार्यश्री कुन्थुसागरमुनीन्द्र !
अत्र अवतर-अवतर संवौषट् अत्याह्वाननम् ।


ॐ ह्रूँ गणाधिपति, गणधराचार्यश्री कुन्थुसागरमुनीन्द्र !
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थानपम् ।


ॐ ह्रूँ गणाधिपति, गणधराचार्यश्री कुन्थुसागरमुनीन्द्र !
अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् सन्निधिकरणम् ।

क्षेत्र की आरती

(तर्ज :- भैया में राखी के बन्ध निभाना)
कुंथुगिरी की आरती कर सुख पाया,
नर-नारी मंगल आरती गाना॥ धृवपद॥

शुभ्र भावों का दीपक लेकर, उसमें नेह का घर में डालूँ,
राधिका का मत अब हाऊ, प्रशमादिक भावों को पा लूँ॥
इन्हीं बावों को उर लाना, हाँ लाना॥
नर-नारी मंगल आरती गाना ॥1॥

आध्यात्मिक धरोहर का रक्षक, आर्ष मार्ग का यह संरक्षक।
देवागम गुरु भक्तिप्रदायक, कर्मविनाशक शिव पथदर्शक ॥
क्षेत्र को शीश नमाना-नमाना।
नर-नारी मंगल आरती गाना ॥2॥

इस क्षेत्र का है अतिशय भारी, इसकी महिमा जग में न्यारी।
जो करता है वन्दन उसका, मन बन जाता शुभ अविकारी॥
आतम ज्योति जगाना-जगाना।
नर-नारी मंगल आरती गाना ॥3॥

सुविधा अरु सन्मति को पाने, आत्मबोध की ज्योत जगाने।
स्वाभाविकता को अपनाने, कामरिपु को दूर भगाने।
भक्ति की सुरभि महकाना-महकाना।
नर-नारी मंगल आरती गाना ॥4॥

गुरु की आरती

(तर्ज :- माही न माही मुण्डेर पे तेरी)
कुन्थुगिरि के भाग्यविधाता, चरणों में तेरे आये,
स्वर्णथाल में रत्नदीप ले, मंगल आरती गाये।
सूरिवर कुन्थुसागर की जय, मुनिवर कुन्थुसागर की जय ॥ धु्रवपद॥

बाठेडा में जन्म लियो है, सोहनदेवी मैया।
आगमज्ञाता पिता तुम्हारे, नाम था पावन रेवा।
बाल कन्हैया की लीला लख, परिजन मन मुसकाये,
स्वर्णथाल में रत्नदीप ले, मंगल आरती गाये।
सूरिवर कुन्थुसागर की जय, मुनिवर कुन्थुसागर की जय ॥1॥

महावीरकीर्ति सूरिवर से, भेष दिगम्बर धारा।
विमलसिन्धु से सूरिपद पाकर, निज आतम संस्कारा।
गुरुवर से गणधरपद पाकर, भविजन पार कराये,
स्वर्णथाल में रत्नदीप ले, मंगल आरती गाये।
सूरिवर कुन्थुसागर की जय, मुनिवर कुन्थुसागर की जय ॥2॥

दीक्षा-शिक्षा देय भव्य को, जिनवृष रक्षा करते।
बिन माँगे ही सब भक्तों की, झोली निशदिन भरते।
भारतगौरव स्वात्महितैषी, तव पद शीश जमाये,
स्वर्णथाल में रत्नदीप ले, मंगल आरती गाये।
सूरवर कुन्थुसागर की जय, मुनिवर कुन्थुसागर की जय ॥3॥

आर्षमार्ग के संरक्षक तुम, मन्त्रशास्त्र के ज्ञाता।
सुविधियुत तप-त्याग करे तुम, आत्मतत्त्व के ध्याता ।
रानीला आणिन्दा आदिक तीर्थक्षेत्र चमकाये,
स्वर्णथाल में रत्नदीप ले, मंगल आरती गाये।
सूरिवर कुन्थुसागर की जय, मुनिवर कुन्थसागर की जय ॥4॥

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